28 अप्रैल 2018

ऐसी है वो मजदूर औरत :)

( चित्र गूगल से साभार  )

सड़क के किनारे पर बैठी 
वह मजदूर औरत 
जिसे मैं जब भी देखता हूँ 
हमेशा ही उसे पत्थरों
जो के बीच घिरा पाता हूँ 
जो सुबह से शाम तक 
चिलचिलाती धुप में हर दिन 
तोड़ती है पत्थर 
दोपहर हो या शाम 
उसके हाथों की गति नहीं रूकती 
फटे पुराने कपड़ो में लिपटी 
पूरे जोश के साथ लगी रहती है 
अपने काम पर 
काम ही तो उसका कर्म है 
जिसे सहारे वह पेट पालती है अपने परिवार का 
सारा दिन काम कर 
जब उसे उसकी मेहनत का फल मिलता है 
अजीब से मुस्कान होती है चेहरे पर 
ऐसी है वो मजदूर औरत !!

- संजय भास्कर   

11 टिप्‍पणियां:

Meena Bhardwaj ने कहा…

बहुत सुन्दर....,हृदयस्पर्शी.....,कर्मरत रहने का संदेश देती रचना :)

Rohitas ghorela ने कहा…

बढ़िया रचना

काम ज्यादा और मेहनताना कम; ये बात हमेशा कचोटती है मुझे.


स्वागत है गम कहाँ जाने वाले थे रायगाँ मेरे (ग़जल 3)

vibha rani Shrivastava ने कहा…

औरत को जहाँ भी पाओगे कर्मरत ही देखोगे
विषय उम्दा चयन है

सदा ने कहा…

वाआआह बहुत ही शानदार 👍👌

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, कश्मीर किसका !? “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

AKANKSHA SAXENA ने कहा…

बहुत ही अच्छा

ज्योति-कलश ने कहा…

सरल ,सुन्दर !

आशा बिष्ट ने कहा…

बहुत सुन्दर

Digamber Naswa ने कहा…

जो मेहनत को ही जानती है ...
भीक उसे मजबूर करती है और धुप दीप्तिमान ...
सुन्दर रचना संजय जी ...

anuradha chauhan ने कहा…

बहुत खूब

Satish Sahi ने कहा…

सुन्दर