18 फ़रवरी 2021

.... बदलाव :)

सभी साथियों को नमस्कार कुछ दिनों से व्यस्ताएं बहुत बढ़ गई है इन्ही कारणों से ब्लॉग को समय नहीं दे पा रहा हूँ पर....आज आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ अपनी नई रचना उम्मीद है आपको पसंद आये.........!!

घर से दफ्तर के लिए
निकलते समय रोज छूट
जाता है 
मेरा लांच बॉक्स और साथ ही
रह जाती है मेरी घड़ी
ये रोज होता हो मेरे साथ 
और
मुझे लौटना पड़ता है उस गली के
मोड़ से
कई वर्षो से ये आदत नहीं बदल पाया मैं
पर अब तक मैं यह नहीं
समझ पाया
जो कुछ वर्षो से नहीं हो पाया
वह कुछ महीनो में कैसे हो पायेगा
अखबार के माध्यम से की गई
तमाम घोषणाएं
समय बम की तरह लगती है
जो अगर नहीं पूरी हो पाई
तो एक बड़े धमाके के साथ
बिखर जायेगा सबकुछ......!!


- संजय भास्कर

18 जून 2020

फ्लाईओवर शहरों के लोगों की लाइफ लाइन :(


फ्लाईओवर पर कविता लिखना 
आसान नही है
फ्लाईओवर पर कविता लिखने से पहले
शहर के लोगो के विचार जान लेना 
जरूरी है 
जो हर रोज या अक्सर फ्लाईओवर
के ऊपर से गुजरते है
क्योंकि वही लोग बात सकते है 
शहर मे फ्लाईओवर होने के फायदे 
वो फ्लाईओवर ही है 
जो शहर के बड़े वाहनो की भीड़ से 
बचाता है 
और लोगो का सफर आसान बनाता है
फ्लाईओवर बनाये ही जाते है 
कई वर्षो तक शहर को 
भारी भीड़ से बचाने के लिए 
और वर्षों तक लोगो का बोझ उठाने के लिए 
वरना साधारण आदमी की तो उम्र बीत 
जाती है 
फ्लाईओवर् का महत्व जानने मे !!

- संजय भास्कर

15 मई 2020

घोसले पर लौटती चिड़ियाँ :(


रोज देखता हूँ घर की छत से
एक बड़ा सा झुण्ड
चिड़ियों का
जो शाम को लौटती है
अपने घोसलों पर
कई बार सोचा लिखू कुछ चिड़ियों
के लिए
जो सारा दिन जंगलों , शहर की इमारतों
के इर्द- गिर्द 
घर के रोशन दानों
से चुनती है दाना
अपने परिवार के लिए
और शाम होते ही लौटती है
अपने घोसलों पर
एक बड़ा झुंड बना कर
पूरे हौसले के साथ  ....!!

- संजय भास्कर 

01 अप्रैल 2020

अलमारी में पड़ी कुछ पुरानी किताबें :)


अलमारी में पड़ी कुछ
पुरानी किताबें
जिन्हे काफी आरसे से
नहीं पढ़ पाया हूँ मैं
जो अलमारी में
पड़े - पड़े अक्सर देखती है मुझे
और देती है आमंत्रण
मुझे पढ़ने के लिए
पर यह सच है
कि इन किताबो को बरसो पहले
मैं खरीद लाया था
बड़े ही शौक से बाजार से
पर उन्हें लाने के बाद नहीं लगा
पाया हाथ उन्हें बरसो से
जीवन की उलझती व्यस्ताओ ने
दूर कर दिया मुझे इन
किताबो से
चाह कर भी नहीं पढ़
पाया हूँ
इन किताबो को बरसो से .... !!

- संजय भास्कर