12 मई 2010

सांभा के रूप में वह हमेशा याद किए जाएंगे।.......... मैक मोहन

फिल्म शोले में डाकू सांभा का किरदार निभाने वाले अभिनेता मैक मोहन का सोमवार को निधन हो गया। 71 वर्षीय मैक मोहन ने मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में आखिरी सांस ली। वह कैंसर से पीड़ित थे।
मैक मोहन ने अपना फिल्मी करियर 1964 में आई हकीकत से शुरू किया था। करीब पांच दशक के अपने करियर में उन्होंने 175 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली 1975 में रिलीज हुई शोले से। शोले में उन्होंने गब्बर सिंह की गैंग के डाकू सांभा का किरदार निभाया था। फिल्म के एक दृश्य में गब्बर कहता है, 'अरे ओ सांभा, कितना इनाम रखे है सरकार हम पर'। इसके जवाब में सांभा कहता है - 'पूरे पचास हजार।' यह डायलाग भारतीय सिनेमा के इतिहास के कुछ सबसे मशहूर डायलाग्स में एक है।
मैक मोहन ने कई अन्य हिट फिल्मों जैसे डान, द बर्निग ट्रेन और सत्ते पे सत्ता में भी काम किया। शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा, सांभा की भूमिका मैक मोहन के अलावा कोई दूसरा इतनी अच्छी तरह नहीं कर सकता था। सांभा के रूप में वह हमेशा याद किए जाएंगे।

मैकमोहन जी को हम सब की ओर से भावभीनी और विनम्र श्रद्धांजलि |

10 मई 2010

बराक ओबामा, नाम तो सुना ही होगा।



बराक ओबामा, नाम तो सुना ही होगा। कुछ समय पहले यह शख्स दुनिया की सबसे बड़ी कथित शक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे। इन महाशय की नियुक्ति पर सबसे ज्यादा खुशी हमें मतलब भारतीयों को हुई थी। हम सोच रहे थे कि वे आतंकवाद के खिलाफ लडऩे में हमारी मदद करेंगे, लेकिन....। वे हमारी किसी भी अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे। उन्होंने पाकिस्तान पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया।
मैं उनके कुछ फोटो आपको दिखाना चाहता हूं...। ताकि आप भी जान सकें प्रेजिडेंट ओबामा का बचपन कैसा था।

08 मई 2010

बस्तों के बोझ में दबे ........मासूम बच्चे..!!!





 स्कूलों के नए सत्र आरभ होने से बच्च  पर बसतो का बोझ लादना शुरू हो गया है 
शनिवार की सुबह साढ़े छह बजे मासूम सा दिखने वाला एक बच्चा अपने दो साथियों के साथ पीठ पर आठ किलो का बस्ता लिए पैदल ही स्कूल चला जा रहा था। देखने में उसकी उम्र लगभग आठ वर्ष रही होगी। पीठ पर बस्ता होने के नाते आगे की ओर झुका हुआ वह अपनी धुन में आगे बढ़ा जा रहा था।
वैसे उसके शरीर का कुल वजन 20 किलो से अधिक नहीं होगा। पूछने पर अपना नाम विशाल कुमार बताया, जो कि नगर के एक महंगे कान्वेंट स्कूल में पढ़ता है। विशाल तो महज एक बानगी है। उसके जैसे तमाम ऐसे बच्चे हैं जो कम उम्र में ही बस्ते के बोझ तले दबे जैसे-तैसे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यह निजी शिक्षा पद्धति का नमूना है। जहां दूसरी व तीसरी कक्षा के छात्रों के पास काफी पुस्तकें हैं। उनका बोझ भी कम नहीं। छह से आठ किलोग्राम तक की पुस्तकें ढोना कान्वेंट स्कूलों ने बच्चों की नियति बना दी है।
मासूम बच्चे बस्तों के बोझ उठाकर कम उम्र में ही कमर जनित बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। निजी विद्यालयों में महंगी किताबों के साथ ही महंगी फीस जहां अभिभावकों को परेशान कर रही है वहीं छात्र भी बस्ते के बोझ तले दबे हुए हैं।
हालत यह है कि केजी वन से लेकर केजी थ्री तक पढ़ने वाले एक बच्चे का सलाना विद्यालय शुल्क हजारों रुपये आता है। ऊपर से महंगे यूनिफार्म तथा आए दिन स्कूल फी के अलावा विद्यालय प्रबंधन की डिमांड से अभिभावक भी पेशोपेश में आ जाते हैं।

07 मई 2010

कुछ कसूर चेहरों का भी होगा ! ! !


कुछ मेरे कदमो का ,
कुछ कसूर अंधेरो का भी होगा
इतनी गुस्ताख निगाहे नहीं हैप्पी ,
कुछ कसूर चेहरों का भी होगा |

05 मई 2010

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया


मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया
हर फिकर को धुएँ में उड़ाता चला गया

बरबादियों का शोक मानना फिजूल था
बरबादियों का जश्न मनाता चला गया
हर फिकर को धुएँ में उड़ा…

जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया में उसको भूलता चला गया
हर फिकर को धुएँ में उड़ा…

ग़म और खुशी में फर्क महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया
हर फिकर को धुएँ में उड़ा…

मेरा पसंदीदा गाना जिसमें एक प्रेरणा है - जीने की।