12 मई 2012

श्रीमति आशालता सक्सेना का अनकहा सच............संजय भास्कर

श्रीमती आशा लता सक्सेना जी 

आप सभी ब्लॉगर साथियों को मेरा सादर नमस्कार काफी दिनों से व्यस्त होने के कारण ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ  पर अब आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ ....!!
 
अभी कुछ दिनों पहले श्रीमती आशालता सक्सेना जी की पुस्तक अनकहा सच ( काव्य संकलन ) पढने को मिला जो  बहुत ही पसंद आया !

जो उन्होंने समर्पण किया है अपने अपनी माता सुप्रसिद्ध कवियित्री स्व. डॉ. (श्रीमती ) ज्ञानवती सक्सेना जी को
 
आशा जी जिन्हें आप सभी आकांशा ब्लॉग में पढ़ते हो आशा जी जिन्होंने हर विषय पर कवितायेँ लिखी है पर ज्यादा तर प्रकृति पर उनकी कविताये मन को बहुत प्रभावित करती हैं |

जीवन में हर व्यक्ति सपने अवश्य देखता है, पर कुछ ही लोगो के सपने साकार होते है जिसे आशा लता जी ने अपने रचना कर्म के स्वप्न को इस आयु में साकार किया है ।
श्रीमती आशा लता सक्सेना उन्ही में से एक है जिन्हें मैं ब्लॉगजगत में माँ का दर्जा देता हूँ !

डॉ. शिव कुमार चौरसिया जी ने उनके बारे में लिखा है :-
 श्रीमती आशा लता सक्सेना जी अपने जीवन में शासकीय सेवा ,घर गृहस्थी ,बेटे बेटियों के पालन पोषण शिक्षा दीक्षा एवं वैवाहिक जिमेदारियां को पूर्ण करते हुए अपने जीवन के तीसरे सोपान में  साहित्य सेवा में प्रवृत हुई है ।
जिस आयु में सामान्य महिलाएं अक्सर देहिक कष्टों का बखान करती है और दुखी-दुखी रहती है उस उम्र आशा जी निरंतर लिखते पढ़ते हुए कविता लेखन कर रही है ......यह एक बड़ी बात है !


............................आशा जी की कविताओ में एक अथक उर्जा ,चिर नूतन उमंग ,सुतः और सकारात्मक सोच परिलक्षित होती है उनका जीवन दर्शन दिखाई देता है जिन्हें आशा जी ने अपने मनके भावो को बड़ी सहजता से अभिव्यक्त किया है !
आशा जी ने अभी तक करीब  पांच सौ रचनाये लिखी है और उन्ही में से सत्तावन रचनाये इस संकलन में समाहित है ।
आशा जी के शब्दों में उनके विचार .......................

मैं तो बस लिख रही हूँ और क्यों लिख रही हूँ , यह नहीं जानती । मेरे मन में तरह तरह के विचार उठते है और इन विचारो के साथ जीवन के कड़वे मीठे अनुभवों का सिलसिला है खुलता जाता है । अनुभूतिय शब्दों का लिबास पहन कर अभिव्यक्त होने लगती है और मैं तो बस उन्हें आकर देती जाती हूँ । यह क्रम पिछले चार-पांच सालो से सतत चल रहा है !
मैं हिंदी साहित्य की विद्यार्थी भी नहीं रही और न ही मैंने काव्य शास्त्र पढ़ा ।इसीलिए साहित्य सृजन  में मेरा परिचय नहीं है, पर मैं बहुत भाग्य शाली हूँ , की मुझे ममतामयी श्रेष्ठ कवियित्री माता से संस्कार मिले है ! यह उनकी संस्कारो का ही फल है विवाह के बाद घर गृहस्थी और शिक्षा सेवा में व्यस्त रही और सेवानिवृति के बाद अध्यन व लेखन से जुडी हूँ  जिसमे मुझे मेरी छोटो बहन कवियित्री श्री मति साधना वैद का भरपूर प्रोत्साहन प्राप्त हुआ है ........!
आशा जी ने अपना अनकहा सच कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है -

दो बोल प्यार के बोले होते /पाते निकट अपने
नए सपने नयनों में पलते/ना रहा होता कुछ भी अनकहा |
यदि अपने मन को टटोला होता चाहत की तपिश कभी समाप्त नहीं होती -
अपनी चाहत को तुम कैसे झुटला पाओगे
मेरी चाहत की ऊंचाई ना छू पाओगे कभी 
खुद ही झुलसते जाओगे उस आग की तपिश में |
उम्र  के आखिती पड़ाव पर यदि अपनों का साथ ना हो तो मन दुखी हो जाता है | मन में कसक गहरी होती है-
होती  है कसक
जब कोई साथ नहीं देता 
उम्र के इस मोड़ पर
 नहीं होता चलना सरल 
लंबी कतार उलझनों की 
पार पाना नहीं सहज |
अपने अतीत को कोई भला भुला पाया है अतीत पर यह देखिये -
जाने कहाँ खो गया 
दूर हो गया बहुत 
जब तक लौट कर आएगा 
बहुत देर होजाएगी 
ना पहचान पाएगा मुझे कैसे |
'प्रतिमा सौंदर्य की ' कविता महाप्राण सूर्य कान्त त्रिपाठी की कविता "वह तोडती पत्थर "की याद ताजा कर देती है |  एक मजदूर स्त्री के प्रति सौन्दर्यानुभूति भाव को बखूबी प्रकट किया है -
प्रातः से संध्या तक वह तोड़ती पत्थर 
भरी धूप में भी नहीं रुकती
गति उसके हाथों की |
जीवन की क्षण भंगुरता उन्हें "सूखी डाली "में दिखाई देती है -
एक दिन काटी जाएगी 
उसकी जीवन लीला 
हो जाएगी समाप्त
सोचती हूँ और कहानी क्या होगी 
इस क्षणभंगुर जीवन की  ?
मैं कुछ लिखना चाहती हूँ कविता अनकहा सच की आत्मा है | कहाजाए तो कुछ अतिशयोक्ति नहीं होगी -
अब मैं  लिखना चाहती हूँ 
आने वाली पीढ़ी के लिए 
मैं क्रान्तिकारी  तो नहीं
 पर सम्यक क्रान्ति चाहती हूँ
हूँ एक बुद्धिजीवी 
चाहती हूँ प्रगति देश की 
मृत्यु एक शाश्वत सत्य है -जो जन्मा है मृत्यु को अवश्य प्राप्त होता है -
होती अजर अमर आत्मा 
है स्वतंत्र जीवन उसका 
नष्ट कभी नहीं होता
शरीर नश्वर है 
जन्म है प्रारम्भ 
मृत्यु है अंत उसका |
"कुछ ना कुछ सीख देती है"रचना जीवन में उत्साह -ऊर्जा का संचार करने वाली आशा वादी रचना है -
सूरज  की प्रथम किरण 
भरती जीवन ऊर्जा से
कल कल बहता जल
सिखाता सतत आगे बढ़ना |
प्रत्येक  व्यक्ति का जीवन एक डायरी की तरह है  जिसमें अंकित होती हैं सुख -दुःख ,यादों की खट्टी मीठी बातें 
डायरी का हर पन्ना कोई मिटा नहीं सकता क्यों कि -
पेन्सिल से जो भी लिखा था 
रबर से मिट भी गया 
पर मन के पन्नों पर जो अंकित
उसे मिटाऊँ कैसे ?
अब आखिर में अनकहा सच ( काव्य संकलन ) की पहली रचना आपको पढवाते है !

अनकहा सच  
 कुछ हमने कहा
 कुछ तुमने सुना 
बहुत कुछ छूट गया है अनकहा 
न संबोधन न कोई रिश्ता 
न टोल सके भावो को 
छुप-छुप कर बात कही मन की 
उसे न सजा सके शब्दों में  
संवाद रहित अनजाना रिश्ता  
न जता पाए 
न लिया , दिया कभी कुछ भी 
यह कमी सदा ही रही खलती 
अलग हट कर सोचा होता 
अंतर टटोला होता 
दो बोल प्यार के बोले होते 
पाते निकट अपने नए सपने नैनों में पलते 
.................. न रहा होता कुछ भी अनकहा  ! !

 मेरी और से श्रीमति आशा सक्सेना जी को काव्य संकलन के लिए हार्दिक बधाई व ढेरो 
शुभकामनाये ........!


@  संजय भास्कर



19 अप्रैल 2012

बेटे और बेटियो में फर्क क्या यही मॉडर्न समाज की पहचान है......?

बेटे और बेटियो में फर्क क्या यही सभ्य समाज की पहचान है ।



आज हमारे देश के पुरुष प्रधान समाज में जिस तरह से लड़कियों और महिलाओं के साथ भेद भाव किया जाता है उससे पीछा छुड़ाना कोई आसान काम नहीं है पर सामाजिक स्तर पर इस कमी को दूर करने के लिए कड़े उपाय होने चाहिए !
आज के समय में अभीवावक ही बच्चों के शत्रु बनते जा रहे है। सबसे ज्यादा भ्रूण हत्याओं में शिक्षित और शहरी वर्ग के लोग शामिल हैं। एक पुरूष से स्त्री की शक्ति तीन गुना अधिक है, इसलिए कन्या को देवी का दर्जा दिया गया है।
अक्सर कई माता-पिता कहते हैं कि वे लड़के-लड़की में भेद नहीं करते। पर यह किसी भी दृष्टि से समानता नहीं है बल्कि विध्वंस है। समस्या यह है कि हम पीछे की बात नहीं समझते। हमें शरीर दिख रहे हैं कि यह स्त्री है और यह पुरूष। सोचिए कि प्रकृति गर्भ में कैसे तय करती है कि पुरूष कौन होगा और स्त्री कौन? दोनों के अलग-अलग गुण हैं। स्त्री और पुरूष को अलग-अलग रास्तों से गुजरना है।
परंपरा में ऎसी कई चीजें आई जिसे हम अंधविश्वास कहने लगे। मां का यह कर्तव्य है कि वह बेटी को अच्छी स्त्री बनना सिखाए। बच्ची के पास ज्ञान नहीं पहुंचता कि किन गुणों के कारण स्त्री है। नतीजा यह है कि दिनों-दिन तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। वह शरीर से तो स्त्री है पर उसके गुण स्त्रिओ जैसे नहीं है। वह पुरूष बन रही है और पुरूष तो पुरूष है ही।
आज लड़कियां कॅरियर की लड़ाई में प्रतियोगी हो गई हैं। वे लड़कों की तरह सोचने लगी हैं। पुरूष सूरज है तो महिला चंद्रमा। महिलाओं में धैर्य, प्रेम, निष्ठा, दया जैसे गुण होने चाहिए। चंद्रमा के यही गुण हैं लेकिन समस्या यह है कि लड़कियों का इमोशनल लेवल कम हो रहा है। स्थिति यह है कि आज लड़कियां, स्त्री होने के गुण को नहीं समझ रही हैं क्योंकि उनकी माताएं उन्हें इसकी शिक्षा ही नहीं दे रही हैं। 
क्या यही सभ्य और मॉडर्न समाज की पहचान है ? बेटी की सबसे बड़ी दुश्मन है हमारी सामाजिक रूढियां। बेटा न हो तो समाज में लोग ताना मारते हैं। जरूरत बेटे और बेटी में अंतर बताने वालों को ताना मारने की है। जिस देश में " इंदिरा गांधी " और " मदर टेरेसा " जैसी हस्तियां हुई, वहां ये दुर्दशा सोच का विषय है। आज भी देखें तो राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष की नेता जैसे बड़े पदों पर महिलाओं का परचम लहरा रहा है। फिर भी लोग यह कुरीति छोड़ने को तैयार नहीं। जरूरत है नई चेतना की,जो सिर्फ शिक्षा के माध्यम से ही आएगी । उदाहरण के तौर पर केरल सामने है। केरल देश का सबसे शिक्षित प्रदेश है और वहाँ पर लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या पुरूषों से ज्यादा है.....!!

-- संजय भास्कर 



 



06 अप्रैल 2012

ब्लॉग जगत की बड़ी शख्सियत गुरदेव समीर लाल.....संजय भास्कर

आज कई दिनों बाद ब्लॉग पढने के लिए ओपन किया तो सबसे पहले समीर लाल जी की  रचना  ....बुरा हाल है ये मेरी जिन्दगी का...... उसे पढने के बाद अचनाक गुरदेव समीर जी  की करीब दो साल पुरानी रचना |
की कुछ लाइन याद आ गई जो आपको भी याद होगी शायद....... !!!!


अर्थी उठी तो काँधे कम थे,
मिले न साथ निभाने लोग
बनी मज़ार, भीड़ को देखा,
आ गये फूल चढ़ाने लोग... !


समीर लाल जी ब्‍लॉगजगत की ऐसी शख्सियत हैं जिनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है इनका लेखन जिस विषय पर भी हो प्रत्‍येक शब्‍द दिल को छूकर गुज़र जाता है चाहे किसी भी विषय पर लिखे शब्द अपने आप बनते चले जाते है जो उनकी ऊर्जावान जीवन शैली का प्रतीक है.........!




 .......... मुझे बहुत ही पसंद आई  आई समीर लाल जी के बारे में लिखना तो बहुत समय से चाहता था पर समय के आभाव के कारण नहीं लिख पाया पर आज इन पंक्तियो के याद आते ही समीर जी के लिए लिखने का समय निकल ही लिया और सोचा आप सभी को इस रचना से दोबारा रूबरू करवा दूं समीर जी की रचनाओ का कायल हूँ मैं और ब्लॉग जगत में शामिल होने के बाद करीब दो सालो से समीर जो पढ़ रहा हूँ उनके लिखने का अंदाज ही अलग है जो हमे बहुत ही भाता है .......समीर जी का ब्लॉग जब भी पढता हूँ तो बस एक ही शब्द ज़बान पर आता है जय हो गुरदेव समीर जी ! मुझे उनकी हर पोस्ट से कुछ न कुछ सिखने को मिलता है मैं हमेशा यही चाहता हूँ की समीर जी हमेशा मेरा मार्गदर्शन करते  रहें ...........!!!




दुनिया दिखावे की :--


अर्थी उठी तो काँधे कम थे,
मिले न साथ निभाने लोग
बनी मज़ार, भीड़ को देखा,
आ गये फूल चढ़ाने लोग...
दुनिया दिखावे की हो चली है. कोई भी कार्य जिसमें नाम न मिले, लोग न जाने- कोई करना ही नहीं चाहता. दिखावा न हो तो बस फिर मैं!!
जिस भी कार्य में मेरा फायदा हो, वो ही मैं करुँगा. संवेदनशीलता मरी. साथ मरी सहनशीलता. अहम उठ खड़ा हुआ दस शीश लेकर. एक कटे और दस और खड़े हो जायें. कोई झुकना ही नहीं चाहता. कोई सहना ही नहीं चाहता.
छोटी छोटी बातें, जो मात्र चुप रह कर टाली जा सकती हैं, वो इसी अहम के चलते इतनी बड़ी हो जाती हैं कि फिर टाले नहीं टलती.
कब और कैसे सब बदला, नहीं जानता मगर बदला तो है.
कुछ दिन पहले किसी बहाव में एक रचना उगी थी:


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दो समांतर रेखायें
साथ चल तो सकती हैं..
अनन्त तक..
लेकिन
मिल नहीं सकती...
मिलने के लिए उन्हें
झुकना ही होगा..
आओ!!
थोड़ा मैं झुकूँ
थोड़ा तुम झुको!!
यूँ तो
तुमसे मिलने की चाह में
मैं पूरा झुक जाऊँ
लेकिन
डर है कि
अधिक झुकने की
इस कोशिश में
टूट न जाऊँ मैं कहीं...
और
तुम्हें तो पता होगा!!
टूटे हुए वृक्ष सूख जाया करते हैं!!
- समीर लाल ’समीर’ 

इसी के साथ समीर जी की एक पुरानी आपको पढवाते है !
...............................समीर की लेखनी से बहुत प्रभावित हूँ समीर जी की लेखनी में बहुत दम है, समीर लाल जी बहुत ही लोकप्रिय लेखक व हर ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले चर्चित टिप्पणीकार है। उनका स्वंय का जीवन भी किसी उपन्यास से कम नहीं है। उनके बारे में लिखना ही किसी बड़ी उपलब्धि है !
और एक बात हमे अबी तक समीर जी मिलने का सोभाग्य ही प्राप्त नहीं हुआ.....पर यह इच्छा कभी तो पूरी होगी !


-- संजय भास्कर

14 मार्च 2012

कुछ हट के--अग्रोहा धाम की यात्रा के कुछ पल ......संजय भास्कर

**********जय बजरंग बली*************
मेरी अग्रोहा धाम की सैर के कुछ पल
ब्लॉग पर इस बार कुछ हट आप सभी मित्रो के लिए
आप सभी ब्लॉगर साथियों को मेरा सादर नमस्कार काफी दिनों से ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ  पर अब आज अपने छोटे से यात्रा संस्मरण के साथ आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ
घुमने तो अक्सर जाना हो ही जाता है पर पहले कभी इतना विशेष ध्यान नहीं दिया पर इस बार अग्रोहा धाम गया तो  मंदिर को बारीकी से देखा व मंदिर के बारे में काफी जानकारी मिली जिसे आपके सामने चित्रों के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ !
ब्लॉग जगत दो घुमक्कड़ नीरज भाई ( मुसाफिर हूँ यारों )और संदीप भाई ( जाट देवता )जी तस्वीरों के साथ यात्रा संस्मरण लिखने के लिए जाने जाते है जो सभी ब्लॉग मित्रो की पसंद है ये जहाँ भी जाते है चित्रों के साथ पूरा संस्मरण लिखते है ।
इन्ही भाइयो से प्रेरणा पा कर मैं भी आज अपनी अग्रोहा यात्रा का विवरण लिखा है वो भी चित्रों के साथ
मुझे उम्मीद है आप सभी को पसंद आएगा ............!!
ब्लॉग पर अबकी बार कुछ हट आप सभी मित्रो के लिए
अग्रोहा ( हरियाणा ) देहली रोड पर 190 K.M हिसार जिले में है जिसे महाराजा अग्रसेन जी की राजधानी जाना जाता है अभी कुछ दिन पहले अग्रोहा घुमने जाना हुआ ...............अग्रोहा है हमारे शहर से केवल 25 km ही पर कभी समय नहीं मिला जाने का पर इस शिवरात्रि को छुट्टी होने के कारण वहाँ जाने का मन बना ही लिया
....................आइये आपको भी अग्रोहा धाम की  सैर करवाते है!

 मंदिर का मुख्य द्वार 

मंदिर  के द्वार  पर बनी हाथी बड़ी मूर्ति जो आकर्षण का केंद्र है
मंदिर के उपरी भाग पर कृष्ण अर्जुन की मूर्ति बहुत ही आकर्षक है

मंदिर के बायीं और बनी शिव जी विशाल प्रतिमा 

अग्रोहा धाम प्राचीन कल से ही अनेको कथाये जुडी हुई है यहाँ का नवनिर्मित मंदिर पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थल  है यहाँ हमेशा पर्यटकों का आना जाना लगा ही रहता है । यहाँ का मुख्य आकर्षण मंदिर में टीले पर बनी 90 फुट ऊँची हनुमान जी की प्रतिमा  है जो राष्ट्रीय
 राजमार्ग से गुजरने वालो के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है !

 हनुमान जी की 90 फीट ऊँची प्रतिमा

यह प्रतिमा इसलिए आकर्षण का केंद्र हुई है इसकी उचाई बहुत ज्यादा है जो यहाँ से गुजरने वाले यात्रियों का ध्यान अनायास ही इस और चला जाता है ।

मंदिर के दाहिनी और बनी सुंदर प्रतिमा

मंदिर के पिछले भाग में बनी मुर्तिया जो समुद्र मंथन का दर्शया दिखा रही है


आइये आपको कुछ और जानकारी देते है जो मंदिर के पुजारी द्वारा हमे पता चली ,
 इस मूर्ति को बनाने के पीछे एक चमत्कारिक घटना बताई जाती है । जो सन 1997 की है बताया जाता है
 इस मंदिर में नोकायण स्थल के लिए जब खुदाई की जा राही थी , तो अचानक खुदाई के समय जमीन के गर्भ से बजरंग बली की पाषण मूर्ति मिली ।
जो करीब २ फीट ऊँची थी ............बताया जाता है जब यह खबर लोगो के कानो में पहुची तो आस पास के
शहरो से काफी लोग इकट्ठे हो गए ........सारा दिन कीर्तन चलता रहा उसके बाद इस बड़ी मूर्ति का निर्माण करवाया गया ।
जिसे बनाने में पूरे दो वर्ष लगे । जिसे कोलकाता के किसी मूर्तिकार ने बनाया है !
......और एक खास बात जो हमे बाद में किसी शिक्षक से पता चली इस .....इस प्रतिमा में 50 करोड़ बार  ' श्री राम ' नाम लिख कर डाले गए है जो देश के विभिन्न कोनो से हनुमान जी व राम भगत लोगो द्वारा लिखवाए गए है ।
इस प्रकार इस प्रतिमा का महत्व बहुत ज्यादा है हर वर्ष हनुमान जयंती पर यहाँ भव्य मेले का आयोजन किया जाता है जिसमे दूर दराज से श्रदालु यहाँ आते है  मान्यता  है की यहाँ आने पर श्रदालुओ की मनोकामनाएं पूर्ण होती है !
 एक और खास बात मंदिर के विषय में  
इस मंदिर की नीचे के भाग में एक गर्भ गुफा भी है जिसके अन्दर कई स्थानों पर मुर्तिया है जिसे वैष्णो देवी गुफा की तरह बनाया गया है ! गुफा के अन्दर सभी देवियों की मुर्तिया स्थापित है गुफा की यात्रा करने में करीं अध घंटे का समय लगता है सभी मनोरंजन हेतु सभी साधन है .....बाहर से आने वालो के लिए ठहरने की सुविधा भी है  इसी के साथ संस्मरण समाप्त होता है ।


 आशा है आप मित्रो का जब भी कभी इस तरफ आना हो आप भी अग्रोहा धाम के दर्शन जरूर करें उम्मीद है सभी को पसंद आएगा !

................. धन्यवाद !!!!!!


-- संजय भास्कर 


 

06 फ़रवरी 2012

......अनाम रिश्ते.....संजय भास्कर

आप सभी ब्लॉगर साथियों को मेरा सादर नमस्कार काफी दिनों से व्यस्त होने के कारण ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ  पर अब आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ अपनी नई कविता के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आयेगी..!!




कुछ रिश्ते अनाम होते है 
पर वो रिश्ते दिल के करीब होते है 
अनाम होने पर भी रिश्ते 
........... कायम रहते है !
पर जब भी उन्हें नाम देने की कोशिश 
.............की जाती है !
तो जाने क्‍यूँ
वो रिश्ते लड़खड़ाने लगते है 
नाम से रिश्ते तो बन्ध जाते है !
पर बेनाम आगे बढते जाते है 
न कोई बंधन और न ही कोई सहारा 
सच्ची मुस्कान लिए होते है 
..............अनाम रिश्ते !
सभी बन्धनों से मुक्त ,
बिना किसी सहारे के लम्बी दूरी तक 
साथ निभाते है अनाम रिश्ते ! 
हमेशा दिल के पास होते है 
ये अनाम रिश्‍ते
अपनेपन का नाम साथ लेकर ही
.............बस खास होते है !


-- संजय भास्कर