26 सितंबर 2010

आसमान के सितारों को मैंने रोते देखा .........!!!!!


आसमान के सितारों को मैंने रोते देखा ,
उदासी का गम ढ़ोते देखा
देखा सब को तड़पते हुए,
सारी रात मैंने पूरे आसमा को तड़पते देखा,
रात की रौशनी को देखा ,
तारो की चमक को देखा
सुबह होते ही इनकी रौशनी को खोते देखा |
थके से आसमा को देखा ,
अन्दर से रोते
अन्दर से चमक दमक खोते देखा
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर
बस सबको रात भर
हमने बेफिक्र सोते हुए देखा |

........संजय कुमार भास्कर 

31 टिप्पणियाँ:


कविता रावत ने कहा…
आसमान के सितारों को मैंने रोते देखा , उदासी का गम ढ़ोते देखा देखा सब तो तड़पते हुए, सारी रात मैंने पूरे आसमा को तड़पते देखा ....man ke gahan udasi ka sundar nayanabhiram chitran

Dr.Ajeet ने कहा…
सभी यूं ही सोते है बेफिक्री में... उम्दा रचना डा.अजीत

Bhushan ने कहा…
कविता में एक बनावट उभर रही है. उसे संरक्षण दें.

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर बस सबको रात भर हमने बेफिक्र सोते हुए देखा | संजय जी.....बड़ी उम्दा पंक्तियाँ हैं वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है. आभार ....

सुधीर ने कहा…
सुंदर कविता पर तारों के बारे में मेरी राय तो कुछ यह है... मन रोया तो तारे रोये सब तो चादर तान कर सोये खुश होकर जब इन्हें निहारो ये भी तुम्हारे साथ हंसेंगे अंधियारे में रह सकते रोशन आओ समझाएं यही कहेंगे

संजय भास्कर ने कहा…
Dhanyawaad @ Kavita ji @ Dr.Ajeet ji @ Bhshan ji @ Virender Chohan ji धन्यवाद, मेरे ब्लॉग से जुड़ने के लिए और बहुमूल्य टिपण्णी देने के लिए

रचना दीक्षित ने कहा…
अच्छी प्रस्तुति, आभार

सतीश सक्सेना ने कहा…
अच्छा प्रयास है हार्दिक शुभकामनायें !

karan ने कहा…
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर बस सबको रात भर हमने बेफिक्र सोते हुए देखा | .............बहुत खूब, लाजबाब !

karan ने कहा…
वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है...

संजय भास्कर ने कहा…
धन्यवाद @ सुधीर जी.. @ रचना दीक्षित जी.. @ सतीश सक्सेना जी.. @ Karan ji सभी की प्रतिक्रियाओं के लिए आभार अपना स्नेह यूँ ही बनाये रहें....”

मनोज कुमार ने कहा…
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं! काव्यशास्त्र (भाग-3)-काव्य-लक्षण (काव्य की परिभाषा), आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

Vandana ! ! ! ने कहा…
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर बस सबको रात भर हमने बेफिक्र सोते हुए देखा बहुत सच्ची बात कह दी आपने कविता के माध्यम से.

आमीन ने कहा…
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर बस सबको रात भर हमने बेफिक्र सोते हुए देखा | ---------------------------- वाह मेरे भाई। आपने तो कहर ढाह दिया। वाकई लाजवाब है, मेरे पास प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं।

ALOK KHARE ने कहा…
sundar sirjan badhai

आमीन ने कहा…
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर बस सबको रात भर हमने बेफिक्र सोते हुए देखा | ---------------------------- वाह मेरे भाई। आपने तो कहर ढाह दिया। वाकई लाजवाब है, मेरे पास प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं।

Akhtar Khan Akela ने कहा…
संजय भाई आसमान के सितारों के रोने का दर्द आपने इस बेदर्द दुनिया के सामने जिस अंदाज़ में पेश किया हे वाकई मजा भी आया और इस दर्द का एहसास भी हो गया. बहुत खूब बधाई हो. अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

संजय भास्कर ने कहा…
धन्यवाद @ मनोज जी.. @ Vandana ji ! @ आमीन जी.. @ ALOK KHARE JI @ अख्तर खान अकेला जी.. .........ब्लॉग में आने और सराहने के लिए आभार!

डॉ टी एस दराल ने कहा…
बढ़िया है ।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
वाह..बढ़िया प्रस्तुति जी

जेन्नी शबनम ने कहा…
bahut sundar rachna, shubhkaamnaayen.

parveen ने कहा…
सार्थक और बेहद खूबसूरत, रचना है....शुभकामनाएं।

arun c roy ने कहा…
बहुत सुंदर कविता.. बधाई

मेरे भाव ने कहा…
बहुत बहुत बधाई अच्छी कविता के लिए..

तिलक राज कपूर ने कहा…
अरे भाई रात चैन से सोने के लिये होती है, ये देखा दाखी में वक्‍त खराब मत किया करो। अब आप अगली कविता में यह न कहना कि रात का दर्द मैं चुपचाप सुना करता हूँ है न आईडिया सर जी।

M VERMA ने कहा…
कोई नहीं जताता हमदर्दी तारो पर बस सबको रात भर हमने बेफिक्र सोते हुए देखा | चलो कुछ लोग तो बेफिक्र सो रहे हैं वर्ना आज के समय में तो नींद भी नहीं आती ... सुन्दर रचना रचा है आपने

Udan Tashtari ने कहा…
दूसरों की तकलीफ नजर अंदाज कर बेफिक्र सोना तो आज इन्सान की फितरत बन गई है... देखा सब तो तड़पते हुए ///शायद तो की जगह को/// -बाकी बढ़िया/

संजय भास्कर ने कहा…
धन्यवाद @ डॉ टी एस दराल जी.. @ विनोद कुमार पांडेय जी.. @ जेन्नी शबनम जी.. @ Arun C Roy Ji @ मेरे भाव जी.. @ तिलक राज कपूर जी.. @ M VERMA JI @ Udan Tashtari Ji आप सभी की प्रतिक्रियाओं के लिए आभार. अपना स्नेह यूँ ही बनाये रहें. .......ब्लॉग में आने और सराहने के लिए आभार!

संजय भास्कर ने कहा…
Udan Tashtari Ji Apka Bahut Bhaut Abhaar Meri galti Se Avgat Karane ke liye Sanjay Bhaskar

ZEAL ने कहा…
. संजय जी, कवी-ह्रदय को समझ पाना मेरे बस की बात नहीं। एक दो बार प्रयास किया लेकिन हार गयी। इसलिए अभी भी नहीं जानती की कवि , इस कविता के माध्यम से क्या कहना चाहता है । अपनी तो स्पष्ट एवं सरल शब्दों में कहने की आदत है। इसलिए तारों को देखकर जो ख़याल मेरे मन में आता है वो कुछ इस प्रकार है-- तारों की छाँव में , चन्द्रमा की शीतल किरणों के मध्य इंदलोक में अप्सराएं नृत्य करती होंगी, मधुर संगीत गुन्जायेमान होगा। न तो वहां दुःख होगा, न ही आंसू होंगे। हर तरफ अलौकिक आभा बिखरी होगी । रोते तो पृथ्वी के कमज़ोर लोग हैं। मैं भी कभी-कभी रोती हूँ। लेकिन दिल भर कर रोने के बाद दोगुनी ऊर्जा के साथ जगमगाते तारों भरे आकाश को मुट्ठी में समेटने की कोशिश में पुनः लग जाती हूँ। आभार। .

दीपक 'मशाल' ने कहा…
बढ़िया रचना जन्मदिन पर आपकी शुभकामनाओं ने मेरा हौसला भी बढाया और यकीं भी दिलाया कि मैं कुछ अच्छा कर सकता हूँ.. ऐसे ही स्नेह बनाये रखें..

24 सितंबर 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-५ (व्यंग्य)

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-५ (व्यंग्य)
" दामादजी बिल्कुल सही कह रहे हैं "----- तब तक ससुरजी शोपिंग कर लौट आये थे------" आज मैंने महात्मा गांधी की तस्वीर खोजी.....नहीं मिली फ़िर चिर-यौवना मल्लिका शेरावतजी की तस्वीर ले आया. यह सोचकर कि किन हालातों में इस लङकी ने अपने वस्त्र का त्याग किया होगा ?"
मैंने समानपूर्वक उन्हें समझाया---" पिताजी ये फ़िल्म की हिरोईन है. अपने शरीर को दिखाकर ये करोङो रुपये कमाती है". वह चौंक गये------" शरीर को दिखाकर करोङो रुपये ..? कैसे..?"
"लोग इनके शरीर को देखना चाहते हैं इसलिये.."
" वाह जन-इच्छा का कितना सम्मान करती है यह अबला "
" पापाजी आप गलत समझ रहे हैं. इन हिरोइन को तो एक्टिंग करना चाहिये न ? "
" ये अच्छा एक्टिंग नहीं करती क्या..?"
" अच्छा एक्टिंग करती है लेकिन आज-कल के लोग सिर्फ़ आंग-प्रदर्शन देखना चाहते हैं. "
" फ़िर.......मैं तो इसी हालात की बात कर रहा था. हालात ही ऐसे हो गये हैं जिससे इस बेचारी मल्लिका शेरावत को स्वयं अपना चीर-हरण करना पङा. कौरव- पांडव सभी एक जैसे हो गये. द्रौपदी करे भी तो क्या. महाभारत की पांचाली...आधुनिक भारत की सहस्त्रचाली बन गयी. धृतराष्ट्र तब भी अंधा था और आज भी अंधा है."---ससुरजी कुछ देर तक शांत रहे फ़िर अपनी बेटी से कहने लगे-----" अब तो बाजार भी बहुत बदल गया है. पहले सत्तु खोजा जब नहीं मिला तो कोल्ड-ड्रींक पी आया. लिट्टी-चोखा भी बाजार से गायब हो गया है .इसलिये मैंने फ़ास्ट फ़ूड पैक करवा लिया ." हमलोगों ने काफ़ी फ़ास्टली फ़ास्ट-फ़ूड खाया और अपने कामों मे लग गये. मक्के की रोटी---सरसो का साग और आलू चोखा---सत्तु लिट्टी जैसे विशुद्ध भारतीय खानों पर आजकल फ़ास्ट-फ़ूड और कोल्ड ड्रींक हावी है. यदि इस समय आप लंच या डीनर न कर रहे हों तो मैं उस फ़ास्ट फ़ूड का एफ़ेक्ट बताना चाहुंगा. कुछ देर में खतरनाक रुप से घर में प्रदुषण भी फ़ैला और ग्लोबल वार्मिंग भी बढता चला गया. ससुर दामाद का हमारा संबंध ही इतना मधुर रहा है कि हम दोनों में से किसी ने एक दूसरे पर उंगलिया नहीं उठायी. जबकि घर में फ़ैल रहे प्रदुषण में हम दोनों के योगदान के बारे में हम कन्फ़र्म थे. विडंबना देखिये कि हमारी उंगलियां वायु ग्रहण और त्याग स्थलों के इर्द-गिर्द मंडराता रही. प्रकृर्ति के नियम के मुताबिक इन छिद्रों को बंद भी नहीं किया जा सकता. हमारा पेट तो गैस का सिलिंडर बन ही चुका था. वो तो अच्छा था कि किसी ने माचिस की तिल्ली नहीं जलायी. हम दोनों ससुर दामाद एक दूसरे की समस्या को जान रहे थे लेकिन एक दूसरे से कहते भी तो क्या..इसी बीच टिकू आकर पूछने लगा----"नानाजी ग्लोबल वार्मिंग से क्या होता है ?" पता नहीं टिंकू खुद इस समस्या से परेशान था या शरारत कर रहा था. जो भी हो ससुरजी ने उन्हें समझाना चालू किया----" ग्लोबल वार्मिंग से तापमान बढ जाता है. घर को ठंढा रखो तो सब ठीक है....लेकिन यदि ग्लेशियर पिघले लगे तो जीना मुश्किल हो जाता है."----- अचानक ससुरजी का चेहरा लाल हो गया----" कल विस्तार से बताउंगा." कहते हुए दीर्घशंका के लिये लघु कक्ष में प्रवेश कर गये. जब उनका पुराना ग्लेशियर पिघलने लगा था तो पता नहीं मेरे ग्लेशियर का क्या होनेवाला था.
अगले भाग में फ़ास्ट-फ़ूड का एफ़ेक्ट जारी रहेगा... क्रमश

( शुरु के तीन भाग krantidut.blogspot.com पर देख सकते हैं)
( नोट :- यह पोस्ट हमारे प्रिय अरविंद झा जी द्वारा लिखी गई है, तकनीकी कारणों से वे इसे स्वयं के ब्लॉग - क्रांतिदूत पर पोस्ट नहीं कर पा रहे हैं इसलिए यहाँ प्रकाशित है .... आपकी प्रतिक्रया अपेक्षित है, धन्यवाद )

23 सितंबर 2010

.....................आज मैं क्या लिखूं?


आज मैं क्या लिखूं?
हाँ बहुत दिन होगए है,
ख्यालों के बादल भी कम हो गए है,
साफ़ साफ़ सा है विचारों का आसमां
इसी सोच में हूँ की आज मैं क्या लिखूं?

कुछ दिनों से परेशां था मैं,
कुछ दिनों से खुश भी था,
आज फिर हुई है वो नाराज़ मुझसे,
फिर इसी सोच में हूँ की उन्हें मनाने के लिए आज मैं क्या लिखूं?

लगता है जैसे इक अरसे से खामोशी से दिल लगाकर बैठा हूँ,
बह जाने के अरमान से साहिल पे घर बनाकर बैठा हूँ,
किया है बेसब्री से इंतज़ार जज्बातों की लहरों के आने का,
सोचता हूँ इन लहरों को बुलाने के लिए आज मैं क्या लिखूं?

अब वक्त भी कम मिलता है उनसे मुलाकात का,
की अब दिन भर काम में उलझा रहता हूँ,
करता हूँ आस की लौट आये मेरे फुर्सत के दिन,
इसलिए सोचता हूँ फुर्सत पर आज मैं क्या लिखूं?

एक वो ही तो है जिसके दम से निराशाओं को आशाओं में बदलता हूँ मैं,
वो जिससे ख़ुशी हो या ग़म हर बात कहता हूँ मैं,
नहीं लिखा उसके लिए भी कुछ बड़े दिनों से मैंने,
इसलिए सोचता हूँ उस खुदा के मान में आज मैं क्या लिखूं?

किस्मत........! My Invincible Destiny

मेरे भाई और मित्र अमित जी की एक सुंदर कविता आप तक पहुँचा रहा हूँ .......आपका संजय भास्कर 

आप अपनी अनमोल प्रतिक्रियाओं से  प्रोत्‍साहित कर हौसला बढाईयेगा