23 अगस्त 2010

या फिर बाज़ार में अपने बेटे की कीमत लगाइए ..........!

  
हमने अखबार में पढ़ा एक 'Advertisement '
लिखा था नो दहेज़ ,'No Requirement '
दहेज़ लेना और देना दोनों ही पाप है ,
लिकिन बेटी को सुखी न रखना भी अभिशाप है |
खैर लड़के का  'Bio-Data ' हमे पसंद आया,
जवाब में हमने भी एक पत्र भिजवाया |
अच्छे होटल में रखा लड़की को दिखने का प्रोग्राम ,
बिल देखकर मुह से निकला है हाय  राम  |
लड़के को लड़की और लड़की को लड़का पसंद आया ,
लड़के के माँ बाप ने हमारे घर आने का प्रोग्राम बनाया 
आकर बोले ये छोटे -छोटे सामान की List  है ,
जो आपकी बेटी के लिए Must  है |
डबल बेड और सोफे  के बिना जिंदगी अधूरी है ,
और एक ' Honda-City '  भी घूमने के लिए ज़रूरी है ,
कैश भी कम से कम चार लाख तो चाहिए ,
साथ में ' Diamond ' के जवाहरात तो पहनाइए |
हमने जब यह सुनी बात 
क्रोध से बोले -आप अब तशरीफ़ उठाइए |
किसी और का द्वार खट खट इए ,
या फिर बाज़ार में अपने बेटे की कीमत लगाइए  |

......संजय कुमार भास्कर 

19 अगस्त 2010

.........वह तोड़ती पत्थर !

वह तोड़ती पत्थर  !
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर |
वह तोड़ती पत्थर |
कोई न छायादार पेड़ ,वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार ,
श्याम तन, भर बँधा यौवन' ,
नत नयन ,प्रिय कर्म-रत मन 
गुरु  हथौड़ा हाथ ,
करती बार बार प्रहार ,
सामने तरु मालिका अट्टालिका ,प्राकार  |
चढ़  रही थी धूप
गर्मियों के दिन 
दिवा का तमतमाता रूप |
उठी  झुलसाती हुई लू 
रुई ज्यो जलती हुई भू 
गर्द चिनगी छा गई 
प्रायः हुई दोपहर ;
वह तोड़ती पत्थर |
देखते देखा मुझे तो एक बार ,
उस भवन की और देखा छिन्नतार |
देख कर कोई नहीं |
देखा मुझे उस दृष्टि से 
जो मार खा रोई नहीं |
सजा सहज सितार ,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार ,
एक क्षण के बाद वह कांपी सुघर ,
ढुलक माथे से गिरे सीकर ,
लीन होते कर्म में फिर ज्यो कहा-
 ..........  " मै तोड़ती पत्थर "

सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' जी के संकलन  "अनामिका " से ये कविता आप तक
 कुछ दिनों पहले  मैं अपने गाँव इलाहाबाद गया था गाँव में ही मझे इस  कविता को पढने का मौका मिला 
यह कविता उत्तर परदेश में नौवी  कक्षा के  बच्चो के अध्याय में पढाई जा रही है 
निराला जी की कविता मुझे बहुत ही पसंद आई तो सोचा क्यों आप सभी की पुरानी यादें ताजा कर दी जाये  इसीलिए मैंने इसे अपने ब्लॉग पर ले आया |

15 अगस्त 2010

जिसे सर झुकाती है हिंन्द सारी .......स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ.

प्राण भले ही मित्रों  गवाना ,
पर न झंडे को नीचे गिराना |
तीन रंगा है झंडा हमारा बीच चरखा चमकता सितारा ,
शान है यही इज्जत हमारी
जिसे सर झुकाती है हिंन्द सारी |
 
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

सादर 
संजय भास्कर 


13 अगस्त 2010

वट ए कार या फिर वट ए गर्ल.............!


यह है एक निहायत खूबसूरत........। आप क्या समझे, लड़की? आप ठीक ही समझे। 
मैं भी यही समझा था। दरअसल मेरे पास एक मेल आई। जिसमें लिखा था कि वट ए कार। 
मैंने जैसे ही मेल खोली तो मुंह से निकला वट ए गर्ल। 
मुझे इस कार से ज्यादा खूबसूरत यह लड़की लगी। शायद आपको भी। 
मैं इसे ब्लॉग पर इसलिए डाल रहा हूं कि आप भी इन मोहतरमा को देख सकें। 
मैं इनका नाम नहीं जानता, लेकिन इतना जानता हूं कि निस्सान की एक खूबसूरत कार की खूबसूरती को चार चांद लगा रही एक मॉडल है। अब आप बताएं कि आपको क्या लगा। वट ए कार या फिर वट ए गर्ल......???

09 अगस्त 2010

करते है साक्षर ही अधिक भ्रूण हत्या ...............!

 देखा जो ज़माने का प्रचलन ,
तो हुआ व्यथित बहुत मेरा मन  |
तो किया इस पर गहन अध्यन ,
किया मैंने बहुत शोध  | 
हुआ मुझे  बहुत ही अफ़सोस ,
लगा हाथ मेरे , जब यह तथ्य |
हजम हुआ न मुझे ये कटु सत्य ,
करते साक्षर ही अधिक भ्रूण हत्या  |

....संजय भास्कर....