23 मई 2012

खुद को बांधा है शब्‍दों के दायरे में - - संजय भास्कर



अक्सर हम सभी दूसरो पर
कविता लिखते है
पर क्या कभी किसी ने
अपने आप पर लिखी है कविता
खुद को बांधा है शब्‍दों के दायरे में
किया है खुद का अवलोकन
सूक्ष्‍मता से
शायद नहीं पर 
मैं " भास्कर "
अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ !
कौन हूँ मैं
और क्या हूँ !
साधारण से परिवार में जन्मा
माता-पिता के अच्छे संस्कार
पा कर बड़ा हुआ
अपनी पढाई पूरी कर
नौकरी करने लगा
जिससे इच्छाओ को पूरा कर सकूं
अपने माता-पिता की
और जीने के लिए
अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगा
दुनिया से,
इस छोटी सी जिन्दगी में
मेरा कोई वजूद नहीं 
पर फिर भी 
एक नई शुरुआत कर
...................अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ !
परखना चाहता हूँ मैं भी
स्‍वयं को शब्‍दों के इस महाज़ाल में... !!!!


@ संजय भास्कर 

108 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar ने कहा…

संजय जी बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने ... बधाई

Rewa ने कहा…

very true lines......

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

kya bat hai ekdam naya vichar khud par kavita.khud ko shabdon me bandhna ..sundar prastuti.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह संजय जी ... शब्दों के माध्यम से खुद की तलाश बहुत अच्छी लगी ... मज़ा आया पढ़ के ..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये तलाश निरंतर जारी रहे ... और आप सफल हों अपनी तलाश जारी रहे ...

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

साधारण से परिवार में जन्मा
माता-पिता के अच्छे संस्कार
पा कर बड़ा हुआ
अपनी पढाई पूरी कर
नौकरी करने लगा
जिससे इच्छाओ को पूरा कर सकूं
अपने माता-पिता की
और जीने के लिए
अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगा
दुनिया से,

इन पंक्तियों में बहुत सुंदर कविता लिखी है...भाई

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत खूब ! खुद की तलाश सदैव श्रेयस्कर है...शुभकामनायें !

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब, खुद को शब्‍दों के दायरे में रखा है आपने ... बेहतरीन

वन्दना ने कहा…

खुद को तलाशना बढिया है।

Asha Saxena ने कहा…

खुद पर खुले दिल से सत्य स्वीकार करते हुए लिखना सरल नहीं होता |अपने अंदर छिपे
विचारों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करना सब के बस की बात नहीं |
आपका यह प्रयास
सराहनीय हैं |अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई
आशा

Bharat Bhushan ने कहा…

शब्दों का महाजाल स्वयं को समझने में कम ही मदद करता है लेकिन शुरुआत तो इसी से करनी पड़ती है.

Bharat Bhushan ने कहा…

स्वयं को शब्दों में बाँधना बहुत कठिन कार्य है. सुंदर कविता और सुंदर प्यास.

सुज्ञ ने कहा…

सार्थक मनोरथ!!
शुभकामनाएं वह कविता अलंकारों से सही श्रंगाररस से ओतप्रोत शान्तरस धारा के समान प्रवाहित रहे!!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

खुद को जानना और कहना ही कठिन कार्य है और आपने यह किया है,सो बधाई !
...और हाँ,कविता-कर्म सीधे दिल और दर्द से जुड़ा है तो इसलिए सहज भी है जब ऐसा कर सको !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

wah sanjay jee....aadmi apne aap do samajh le bahut badi baat hai..bahut hee acchi rachna..sadar badhayee ke sath

Ravi Rajbhar ने कहा…

Wah Bhaiya,,
Bahut hi khoob ..!!

नीलकमल वैष्णव अनिश ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति संजय भाई, आपने अपने सोच कर कुछ लिखा बहुत बड़ी बात है क्योंकि इंसान को अपने खुद के बारे में किसी के सामने बयाँ करना जरा मुश्किल होता है पर इसके बावजूद आपने ऐसा किया बहुत ही सुन्दर रचना...

expression ने कहा…

आसान नहीं है खुद को परखना और सच कह पाना....

बहुत सुंदर भाव संजय जी.....

सादर.

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत सुन्दर...... एक वक़्त होता है जब इंसान खुद को तलाशता है
एक शेर याद आया ,,,,,,,,तेरी तस्वीर के चरचे हैं जहान में काश मेरी तस्वीर पर भी नजरें इनायत हों किसी की

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बड़ा कठिन यह काम है , फिर भी साधूवाद |
करे जो अपना आकलन , वही बड़ा उस्ताद |

वही बड़ा उस्ताद, दाद देता है रविकर |
रच ले तू विंदास, कुशल से चले सफ़र पर |

मात-पिता आशीष, आपकी सुधी कामना |
हो जावे परिपूर्ण, सत्य का करो सामना ||

रविकर फैजाबादी ने कहा…

http://dineshkidillagi.blogspot.in/2012/05/blog-post_23.html

Anupama Tripathi ने कहा…

खुद की तलाश ही सब से ज्यादा ज़रूरी है ...!!सुंदर प्रयोग ....!!शुभकामनायें....

Sushil ने कहा…

अपने पर लिखना है
लिखते चले जाओ
रुकना मत कभी
चाहे चांद तक हो आओ।
अच्छा जा रहे हो ।

kshama ने कहा…

Wah! Kitni sadagee bharee rachana hai!

veerubhai ने कहा…

दिखाओ खुलके खुद को आइना ,डटके करो सच का सामना ,बड़े भाई दिल संभालना ,दिमाग को खंगालना और ...पूरी करो संजय भाई ... कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
मंगलवार, 22 मई 2012
:रेड मीट और मख्खन डट के खाओ अल्जाइ -मर्स का जोखिम बढ़ाओ
http://veerubhai1947.blogspot.in/
और यहाँ भी -
स्वागत बिधान बरुआ :आमंत्रित करता है लोकमान्य तिलक महापालिका सर्व -साधारण रुग्णालय शीयन ,मुंबई ,बिधान बरुआ साहब को जो अपनी सेक्स चेंज सर्जरी के लिए पैसे की तंगी से जूझ रहें हैं .
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

Reena Maurya ने कहा…

खुद को समझना
खुद तो तलाशना बहुत जरुरी है
तभी तो इन्सान को खुद के पूर्ण या अपूर्ण
होने का ज्ञान होगा..
बहुत ही बेहतरीन और सादगीभरी रचना है:-)

डॉ टी एस दराल ने कहा…

अपनी कमियों को पहचाने बिना कविता अधूरी रहेगी ।
बढ़िया प्रयास है ।

संध्या शर्मा ने कहा…

अपने आप पर कविता लिखना अच्छा लगा ,
आपका अपने आप को परखना अच्छा लगा .
बढ़िया भाव... सुन्दर कविता... शुभकामनाएं

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

यही आध्यात्म है, स्वयं को पहचानना। आगे यहीं से रास्ता वीतरागता की ओर जाता है।

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

यही आध्यात्म है, स्वयं को पहचानना। आगे यहीं से रास्ता वीतरागता की ओर जाता है।

Suresh kumar ने कहा…

Kavitayen to bahut padi pr khud pr likhi hui kavita pahli baar padi. Bahut hi saadgi se or sachai se aapne apne man ke bhavo ko ukera hai . Dhanyawad Sanjay bhai.....

Sadhana Vaid ने कहा…

स्वयं को पहचानना, समझना और अभिव्यक्ति देना बहुत मुश्किल होता है और आपने इस कठिन कार्य को बखूबी अंजाम दिया है ! सुन्दर रचना के लिए बधाई संजय जी !

shalini ने कहा…

सही लिखा है संजय जी, खुद को समझ पाना तो मुश्किल है ही परन्तु उससे भी मुश्किल है खुद को शब्दों के दायरे में कैद कर पाना ....... बहुत अच्छा प्रयास है !

Jyoti Mishra ने कहा…

Loved the concept n theme of this poem..
Awesome writing as ever !!!

Deepak Saini ने कहा…

बहुत कठिन है खुद पर कविता लिखना

सुन्दर कविता

बधाई

Deepti Sharma ने कहा…

bahut hi sunder rachna
:)
kabhi mere blog par bhi aaiye
www.deepti09sharma.blogspot.com

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

मैं " भास्कर "
अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ !
कौन हूँ मैं
और क्या हूँ !
साधारण से परिवार में जन्मा
माता-पिता के अच्छे संस्कार
हाँ संजय भाई आत्मावलोकन बहुत जरुरी होता है ...ये भी सुन्दर कविता बनी ..आप का वजूद ही वजूद हो जिन्दगी रंगीन हो लिख डालिए -शुभ कामनाएं -जय श्री राधे -भ्रमर ५

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

सच को स्वीकार करना , बहुत हिम्मत का काम होता है ..... सच्चाई को करीब रखना ..... !!
जब भी अपने पर कविता लिखना .... !!

dheerendra ने कहा…

मैं " भास्कर "
अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ !
कौन हूँ मैं
और क्या हूँ !
साधारण से परिवार में जन्मा
माता-पिता के अच्छे संस्कार,,,,,,

अपने शब्दों के माध्यम से खुद की तलाश,रचना बहुत अच्छी लगी,,,,,,बधाई

MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़िया...

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट 24/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा - 889:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

abhi bahut kuchh baki hai likhana, apane ko antar se talasho aur phir usako shabdon men dhalo. apani talash kuchh panktiyon men khatm mat karo. abhi saphar bahut aage jana hai aur apani pahachan isase bhi adhik badi banana hai.

Swati Vallabha Raj ने कहा…

bahut hi khub....

Swati Vallabha Raj ने कहा…

bahut hi khub....

मुकेश पाण्डेय चन्दन ने कहा…

जब हम अपने जीवन के सफ़र में किसी मंजिल पर पहुच जाते है , तो एक पड़ाव पर पहुचकर पीछे मुड़कर देखते है . और अपना मूल्याङ्कन करते है . कि हमने क्या पाया ? क्या खोया ?
शायद आप भी इस स्थिति पर पहुच गये है , संजय जी !
अगर हम अपने जीवन में अपना मूल्याङ्कन करते हुए चलते है , तो जीवन सुन्दर बनने लगता है.
आप भी सुन्दर जीवन की और अग्रसर हो ! इसी शुभकामनायो के साथ आत्म्मुल्याकनात्मक कविता पर बधाई स्वीकार करें !

V.P. Singh Rajput ने कहा…

ब्लाग पर आना सार्थक हुआ । काबिलेतारीफ़ है प्रस्तुति । बहुत सुन्दर बहुत खूब...बेहतरीन प्रस्‍तुति
हम आपका स्वागत करते है..vpsrajput.in..
क्रांतिवीर क्यों पथ में सोया?

Suman Anuragi ने कहा…

Really nice attempt.Sanjay Bhaiya.
title touched my heart...
keep writing and god bless u.. :)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही विचारणीय प्रश्न। स्वयं को शब्द में बाँधने के लिये आवश्यक है कि स्वयं के अर्थों को समझ सकें।

यादें....ashok saluja . ने कहा…

अपने आप को परखना सबसे अच्छा काम .....
शुभकामनाएँ!

आकाश सिंह ने कहा…

सुन्दर लेखन "शब्दों के उधेड़ बिन के बिच बहुत ही रोचक कविता" का जन्म | आभार |

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने ... बधाई

सतीश सक्सेना ने कहा…

अच्छा लिखा है संजय ...
आभार !

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता संजय भाई.. काफी दिनों बाद कविता आई है आपकी.. निरंतरता बनाये रखें.. शुभकामनाएं...

yashoda agrawal ने कहा…

शनिवार 26/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है .

धन्यवाद!

रविकर फैजाबादी ने कहा…

मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||

--

शुक्रवारीय चर्चा मंच

mahendra verma ने कहा…

अपने आप को परखना भी कविता लिखने जैसा ही है।
सुंदर रचना।

M VERMA ने कहा…

खुद को शब्दों में बांधना दुरूह कार्य है
बहुत खूब

mridula pradhan ने कहा…

अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ !
परखना चाहता हूँ मैं भी
स्‍वयं को शब्‍दों के इस महाज़ाल में... !!!!
bahot achcha soche hain.....aur likhe hain.....

आशा जोगळेकर ने कहा…

परखना चाहता हूँ अपने आप को
शब्दों के इस महा जाल में ।

वाह, सब की इचछा को शब्द दे दिये ।

veerubhai ने कहा…

खुद से मिलना ,खुद से संवाद करना ,मिलना दृष्टा भाव से खुद से एक बड़ा काम है भविष्य का नीति निर्धारक जैसा .शुक्रिया संजय भाई आपकी ब्लोगिया दस्तक का . कृपया यहाँ भी पधारें -
बेवफाई भी बनती है दिल के दौरों की वजह . http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

स्वंत सुखाया ...जो दिल को अच्छा लगे ...अपने में खुद को खोजना एक अविस्वर्नीय कल्पना हैं ..

ऋता शेखर मधु ने कहा…

सादगी भरे शब्दों में खुद को खूबसूरती से बाँध लिया...

JHAROKHA ने कहा…

aapnebilkul sach likh hai khud par kavita likhna bahut aasaan nahi par aapne badi hi khoobsurti ke apne aapko ya ya apne vyaktitv ko bahut hi sindar shabdo ke saath bayaan kiya hai-----
bahut bahut hi achhi prastuti
poonam

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

बहुत सुंदर

Maheshwari kaneri ने कहा…

जिसने खुद को जाना खुद को पहचाना समझो उसने संसार को समझ लिया..लेकिन आज तो लोग दूसरों को जानने की होड़ में लगे रहते हैं ..बहुत सुन्दर भाव संजय

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

अच्छी रचना... सुन्दर भाव... वाह!
हार्दिक बधाई.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

खुद को जानना और कहना ही कठिन कार्य है.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

India Darpan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


हैल्थ इज वैल्थ
पर पधारेँ।

Upendra Nath ने कहा…

bahut hi achchha prayas hai... sunder kavita.

Ankur jain ने कहा…

वाह संजय जी ..बेहतरीन अभिव्यक्ति

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

जीवन एक कविता ही तो है, जो लिख सको तो लिख लो, क्योंकि दूसरों का सारा सच हम जानते नहीं और अपना सारा सच नहीं सकते नहीं. खुद पर लिखी तो जायेगी पर शायद अधूरी ही लिखी जायेगी कविता. बहुत सुन्दर रचना, बधाई.

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…

ekdum seedhi aur sahi baat..... !

"पलाश" ने कहा…

a simple and sweet poem

pragya ने कहा…

लेकिन आसाँ नहीं होता कई बार ख़ुद पर कविता लिखना..क्योंकि हम अक्सर जब कुछ लिखते हैं तो उसके किसी एक हिस्से, कोण पर लिखते हैं पर जब बात ख़ुद की आती है तो ख़ुद का सिर्फ कोई एक हिस्सा परखना ज़रा मुश्किल हो जाता है....

anju(anu) choudhary ने कहा…

खुद पर लिखना ...आसन नहीं हैं
बहुत कम शब्दों में ,खुद को लिख दिया ..जब कि हमने तो सुना हैं ''खुद को लिखना यानी की ..खुद को छिलेने के बराबर हैं ...''

Dr. sandhya tiwari ने कहा…

bilkul sahi .........achcha likha aapne

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) ने कहा…

Bahut Khoob Bhaskar bhai..khud ko shabdon mai talashne ka yeh andaaz nirala hai.. :))

kumarshivnath.blogspot.com ने कहा…

आपकी कविता आपका और आपके विचारों का ही तो प्रतिबिम्ब है ,,,,
फिर भी खुद पर कविता लिखकर खुद को परखना चाहते हैं तो यह और भी अच्छी बात है ... :)
काफी सुंदर रचना, बधाई !!

Anjani Kumar ने कहा…

एक सुन्दर प्रयास .....स्वयं से स्वयं का परिचय कराना
बहुत शुभकामनायें आपको

veerubhai ने कहा…

यहाँ अदने से अदने का भी महत्व है . एक नई शुरुआत कर
...................अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ !
परखना चाहता हूँ मैं भी
स्‍वयं को शब्‍दों के इस महाज़ाल में... !!!!

फिर मैं तो इंसान हूँ ,देखूं कितना हूँ ,बस इतना ही तो चाहता हूँ ,अपने पे कविता लिखना चाहता हूँ ,अच्छी प्रस्तुति . .कृपया यहाँ भी -

.


बृहस्पतिवार, 31 मई 2012
शगस डिजीज (Chagas Disease)आखिर है क्या ?
शगस डिजीज (Chagas Disease)आखिर है क्या ?

माहिरों ने इस अल्पज्ञात संक्रामक बीमारी को इस छुतहा रोग को जो एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँच सकता है न्यू एच आई वी एड्स ऑफ़ अमेरिका कह दिया है .
http://veerubhai1947.blogspot.in/

गत साठ सालों में छ: इंच बढ़ गया है महिलाओं का कटि प्रदेश (waistline),कमर का घेरा
साधन भी प्रस्तुत कर रहा है बाज़ार जीरो साइज़ हो जाने के .

http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

RAHUL- DIL SE........ ने कहा…

apne aap ki talash.. bahut hi sundar sanjay bhai..

Sneha Gupta ने कहा…

bahut baareeki aur sookshmata ke saath likhi gayi kavita hai. sach hai, dusro ko jaanne se pahle zaruri hai khud ko jaannaa

कविता रावत ने कहा…

सच अपने आप को शब्दों में बयां करना बहुत कठिन है ..
बहुत सुन्दर प्रस्तुति

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

मुश्किल सा होता है खुद को रचना |

सोनरूपा विशाल ने कहा…

फिर तो ये प्रक्रिया तो जीवन पर्यंत चलने वाली है .........

Kailash Sharma ने कहा…

परखना चाहता हूँ मैं भी
स्‍वयं को शब्‍दों के इस महाज़ाल में... !!!!

...बहुत खूब! बहुत सुन्दर रचना.....

विरेन्द्र ने कहा…

बढ़िया है....संजय भाई! लगे रहो।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

किसी मुगालते में न रहें। यह कविता नहीं है। बकवास है इसलिए नहीं कह सकता कि इसके भाव निर्मल हैं, दिल से लिखा है आपने।

Sanju ने कहा…

बहुत अच्छा ब्लॉग और पोस्ट है....
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार।

lori ali ने कहा…

bhasker!!!
its a lovely starting
instead of poem it looks like prose n i will call it lyrical prose. keep it up.

babanpandey ने कहा…

पूरी जिंदगी ही ek कविता hai ... और अपने आप कविता लिखने का मतलब .... apni कमजोरियों को परखना है ...

DINESH PAREEK ने कहा…

आपका भी मेरे ब्लॉग मेरा मन आने के लिए बहुत आभार
आपकी बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना...
आपका मैं फालोवर बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,......
मेरा एक ब्लॉग है

http://dineshpareek19.blogspot.in/

DINESH PAREEK ने कहा…

आपका भी मेरे ब्लॉग मेरा मन आने के लिए बहुत आभार
आपकी बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना...
आपका मैं फालोवर बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,......
मेरा एक ब्लॉग है

http://dineshpareek19.blogspot.in/

Reena Pant ने कहा…

सुंदर रचना

Manish Kr. Khedawat " मनसा " ने कहा…

kya baat hai :D bahut sahi

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

apne ko sadharan kahna asadharan logon ki nishani hoti hai sanjay jee aapki kavita aur sada jee ke kavita sangrah ka vishleshan bhi accha laga...

Vandana KL Grover ने कहा…

Khud ko khud ki nazar se dekh paana ..aur woh bhi itna nishpaksh aur saaadgi se ...itnaa aasaan nahi'n.....khoobsurat hai aapka lekhan ..aur aapka blog.

kunwarji's ने कहा…

आत्मावलोकन करती रचना के माध्यम से स्वयं को जांचने परखने का बेहतरीन प्रयास, खुद को परखने का साहस हर कोई नहीं कर सकता...
100वी टिप्पणी स्वीकार करे भाई...
कुँवर जी,

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति...........

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

amrendra "amar" ने कहा…

वाह ... बहुत खूब,

prritiy----sneh ने कहा…

waah, sach kaha apne par likhna aasan nhi hai, par likha ja sakta hai.
yatharth ko bade achhe se prastut karte hain aap.
shubhkamnayen

प्रेम लोधी ने कहा…

बहुत खूब ... संजय जी .इसी बात पर मेरी एक छोटी सी कविता देखें ----

नहीं झांकते अपने गिरहबान में

छिद्रान्वेषी हैं हम
आपादमस्तक |

बीतता है -
सारा समय हमारा
बुराई करने में दूसरों की |

ढूंढते रहते हैं हम
कमियां , कभी इनकी -कभी उनकी |

करते रहते हैं दिन -रात
इधर की बातें
उधर की बातें ,
लेकिन कभी भी नहीं करते
स्वयं की बातें,
स्वयं से बातें |

उठाते हैं हम उँगलियाँ दूसरों पर
किन्तु ,
कभी भी
नहीं झांकते
अपने गिरहबान में |

प्रेम लोधी ने कहा…

नहीं झांकते अपने गिरहबान में

छिद्रान्वेषी हैं हम
आपादमस्तक |

बीतता है -
सारा समय हमारा
बुराई करने में दूसरों की |

ढूंढते रहते हैं हम
कमियां , कभी इनकी -कभी उनकी |

करते रहते हैं दिन -रात
इधर की बातें
उधर की बातें ,
लेकिन कभी भी नहीं करते
स्वयं की बातें,
स्वयं से बातें |

उठाते हैं हम उँगलियाँ दूसरों पर
किन्तु ,
कभी भी
नहीं झांकते
अपने गिरहबान में |

राज चौहान ने कहा…

अपने शब्दों के माध्यम से खुद की तलाश,रचना बहुत अच्छी लगी,,,,,,बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!