09 अगस्त 2016

आदिवासियों के मसीहा बाबा आमटे :)

कई दिनों बाद आज सुबह जैसे ही ब्लॉग पढ़ने बैठा नर्मदा के बारे में पढ़ रहा था तभी अचानक नर्मदा बचाओ आंदोलन की याद आई और नाम उभर कर आया बाबा आमटे नर्मदा घाटी के आदिवासी मछुआरों, किसानों की आवाज बुलन्द कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले बाबा आमटे
तभी तुरंत कविता दीदी के ब्लॉग पर गया उनके ब्लॉग पर बाबा आमटे के बारे में एक आलेख पढ़ा था कुछ दिनों
नर्मदा बचाओ आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले बाबा आमटे का जन्म 26 दिसम्बर 1914 को हिंगणापुर में हुआ। बाबा जीवन भर दुःखी और रोगी लोगों की सेवा में लगे रहे। युवाओं के लिए वे हमेशा प्ररेणास्रोत बने रहे, जिनके लिए उनका मूल मंत्र था- "हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने, मारने में।" वे एक संवेदनशील कवि और साहित्यकार जिन्होंने सरकार द्वारा उपेक्षित आदिवासियों के दर्द को उन्होंने करीब से जिया और उनके लिए जिन्दगी भर आखिरी सांस तक जूझते-लड़ते रहे, लेकिन हारे नहीं, यह बात उनकी कई कविताओं में साफ देखने को मिलती हैं। ऐसी ही एक कविता "एक  कुम्हलाते फूल का उच्छ्वास" में वे कहते हैं
कविता दीदी के ब्लॉग से साभार 

मैं सतासी का हूँ
एक रीढ़हीन व्यक्ति जो बैठ नहीं पाता
मुरझा  रहा हूँ मैं पंखुरी-ब-पंखुरी

लेकिन, क्या तुम नहीं देखते
मेरा रक्तास्रावी पराग?
मैं निश्चयी हूँ,
मगर ईश्वर मदद करे मेरी
कि रत रहूँ मैं गहरी हमदर्दी में
जो आदिवासियों की बेहाली से है।

वंचित विपन्न आदिवासियों की व्यथा का
किसी भी सत्ता द्वारा अपमान
अश्लील है और अमानवीय
सतासी पर
उम्र मुझे बांधे है दासता में
मैं पा चुका हूँ असह्य आमंत्रण अपने
आखिरी सफर का,
फिर भी मैं डटा हूँ

पाठको, मत लगाओ अवरोधक अपने
आवेग पर
कोई नहीं विजेता
सब के सब आहत हैं, आहत!
एक फूल की इस आह को कान दो!!

एक सच्चे निस्स्वार्थ समाजसेवी बाबा आमटे जी को विनम्र नमन

-- संजय भास्कर 


08 जून 2016

कुछ अधूरी सी कवितायेँ पुरानी डायरी के पन्ने - संजय भास्कर


अक्सर जब कभी मिल जाती है
पुरानी डायरी
तब लगभग हर उस शख्स के चेहरे पर
मुस्कराहट आ जाती है
जिसने कभी इस डायरी में
कुछ सपने संजोये होंगे !                        
डायरी में कैद होते है चंद खुबसूरत लब्ज,
कुछ बीती हुई यादें
कुछ ऐसी पंक्तियाँ
जिनमे में जिक्र होता है
कुछ पुरानी यादों का
हर उन खुबसूरत लम्हों का
तुम्हारी हँसी का
जो कैद होता है
डायरी के उन पन्नो में
ऐसा हर याद का जिक्र जो
समय के साथ धुँधली याद बन गई है !!
और आज नजर गई जब
उस डायरी पर
तब एक लम्हे में जिंदगी जी
लेने का अहसास
मुस्कुराहटें कुछ तस्वीरें
और कुछ अधूरी सी कवितायेँ
और बहुत कुछ बीते कल के बारे में
पुरानी यादों को ताजा कर गया !!

- संजय भास्कर

27 जनवरी 2016

मैं बस जीना चाहता हूँ :))

चित्र - गूगल से साभार
उड़ जाना चाहता हूँ मैं
खोल के बाहें अपनी
थामना चाहता हूँ मैं
सारे आसमान को,
मैं बस उड़ना चाहता हूँ
मत रोको अब
मुझ मतवाले को,
मैं जीना चाहता हूँ !
बस अपनी धुन में
नापना चाहता हूँ
सागर की गहराइयों को,
घर बनाना चाहता हूँ
आसमान में
दोस्ती कर पर्वतो से
हिमालय को झुकाना चाहता हूँ !
मैं बस जीना चाहता हूँ.......!!

-- संजय भास्कर

सभी साथियों को मेरा नमस्कार कुछ दिनों से व्यस्त होने के कारण ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ ज़िंदगी की भागमभाग से कुछ समय बचाकर आज आप सभी के समक्ष उपस्थित हूँ  !