07 नवंबर 2011

विदेश जाने की इच्छा छोड़ दे भारतीय........ संजय भास्कर


आज के समय में भारत का हर नागरिक विदेश जाने की इच्छा रखता है | जिससे भी पूछो वही यही कहेगा जो सुख विदेश में मिलता है वो भारत में कहाँ | भारत को छोड़कर विदेश जाएं की चाह में आज न जाने
कितने लोग इस ग़लतफहमी में है की विदेश जा कर ही बहुत सारा पैसा कमा सकेंगे विदेश जा कर ही नाम कमा सकेंगे , क्या इस सब चीजो की हमारे देश में कोई कमी है ? क्या भारत देश में रह कर नाम
नहीं कमाया जा सकता |
हमारे देश में भी सब सुख सुविधाए उपलब्ध है जो विदेशो में है , अगर पूरी लगन ,
मेहनत के साथ काम किया जाये तो यहाँ रह कर भी नाम  कमाया जा सकता है | विदेश  जाने वाले ये नहीं सोचते की भारतभूमि ऊनके बारे में क्या सोचेगी , भारत भूमि यही सोचेगी की जिन बच्चो का जन्म भारत भूमि पर हुआ वो उस भूमि को छोड़ कर जा रहे है | क्या बच्चो को अपनी भारतभूमि पर विश्वास नहीं था जो दोस्रो की जमीन पर पैर रखने जा रहे है |
भारत भूमि को छोड़कर विदेश जाने की लालसा दिन प्रतिदिन लोगो में बढती जा रही है | इसका कारण यह है 
विदेशी सभ्यता ने भारतीयों की सोचने समझने के तरीके को ही बदल दिया है , आज के समय में विदेश
जाने के लिए भारतीय नागरिक किसी भी हद तक जा सकता है भारत के नागरिको पर विदेशी माया का भूत इस कदर सवार हो चूका है , कि वो विदेश जाने के चक्कर में अपने घर बार ,जमीन आदि बेचकर जो पैसा इक्कठा करते है और उस पैसे को गलत हाथो में दे देते है , आज के दौर में लोग लाखो रूपये  ट्रेवल एजेंटो को सोप कर चले जाते है और या समझने लगने लगते है शायद विदेश जाएं के रास्ते खुल गये  | आज के समय में भारत में बहुत से ऐसे व्यक्ति और एजेंसिया है जो भोले- भाले लोगो को विदेश भेजने के नाम पर लाखो रूपये ऐठ लेते है |
    ट्रेवल एजेंट लोगो को अपनी चिकनी चुपड़ी बातों  में फसा कर उनका घर उजाड़ देते है  आज तक ना जाने  कितनो  के साथ ऐसा धोखा हो चूका है पर हम लोग फिर भी  सबक नहीं सीखते  है भारतीयों ये समझ लेना चहिये की , जो सुख शांति पैसा रिश्ते नाते रीती रिवाज आपस का भाई चारा  भारत में मौजूद है | वह  विश्व के किसी कोने में नहीं है  भारतीयों में जो अपने पन की भावना है वो कहीं नहीं है ! परन्तु आज भारत देश को 
ऊँचे शिखर तक ले जाने के लिए हमे सच्ची लगन व्  इमानदारी से देश की सेवा करनी होगी |
......सभी भारतीयों  की अपने देश की शान के लिए  अपने जान तक न्योछावर कर देना  चाहिए |
इस बात को भारतीय अच्छी तरह से जान ले की विदेश में भारतीय पैसा तो कमा लेते है पर प्यार और अपनेपन की भावना को खो देते है |
.....इसीलिए भारतीय विदेश जाने की इच्छा न करे क्योकि जो प्यार और अपनेपन की भावना भारत देश 
में है और कहीं भी नहीं है ..............!

-- संजय भास्कर

120 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

जाने लोगों को पता है कि वहाँ पर जाकर दुर्गति होनी है, किन्तु पैसौं के लालच में चले ही जाते है।

दिलबाग विर्क ने कहा…

बिल्कुल सही कहा

Yogesh ने कहा…

मगर मेरे ए दोस्त, वहाँ जाने वाला व्यक्ति अगर legal तरीके से जाता है और खूब पैसा बनाता है, तो उसमे बुरा क्या है ?

यहाँ पे अगर कोई 30000 कमा रहा है, तो वहाँ $ में कमाता है और इस से 4-5 गुना save कर लेता है...

Bhushan ने कहा…

संजय जी,आपकी भावना सम्मानयोग्य है. दूसरी ओर यह भी देखना होगा दुनिया सिमट गई है. विभिन्न देशों के नागरिक दूसरे देशों में जाकर रोज़गार के अवसर तलाश रहे हैं. कुछ युवा ठगी का शिकार होते हैं लेकिन यह ऐसा कारण नहीं कि दुनिया में लोगों का अवसर तलाशना बंद हो जाए. हाँ आपके इस विचार से नज़र नहीं फेरी जा सकती कि भारत की बौद्धिक शक्ति का लाभ भारत को अधिकतम होना चाहिए. बढ़िया आलेख.

Human ने कहा…

बहुत सही बात कही है आपने संजय जी,उत्कृष्ट लेख !

मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है कृपया अपने महत्त्वपूर्ण विचारों से अवगत कराएँ ।
http://poetry-kavita.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सार्थक आलेख!
जय भारत!
वन्देमातरम्!

POOJA... ने कहा…

post bahut acchhi hai... parantu bhai kabhi-kabhi log videsh padhne ya kisi research ke silsile mei bhi jaate hain, kuch paise kamane jaate hain... aur koun kamana nahi chahta... thod aaur" ye hamari insaani fitrat hai... haan jab bhi jana ho to legal tareeke apnanane chahiye... nuksaan tab hota hai jab ham short-cut use karte hain... fir chahe wo videsh jane mei ho ya yahi kahi ghoomne jane mei...

kshama ने कहा…

.....इसीलिए भारतीय विदेश जाने की इच्छा न करे क्योकि जो प्यार और अपनेपन की भावना भारत देश
में है और कहीं भी नहीं है ..............!
Shat pratishat sahee hai! Bharat jaisa apnapan aur kaheen nahee.

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

aapse sahmat hoon

सुमन'मीत' ने कहा…

bilkul sahi kha bhaskar ji...apna desh apna hi hai ...videsh me vo baat khan ...

बेनामी ने कहा…

bilkul, kyonki aisa corruption aur kahan milga..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अपने देश जैसा कोई और देश नहीं ... पर यह बात स्वयं ही महसूस करने की है .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अपने देश जैसा सुख सच में कहीं नहीं है

Rajesh Kumari ने कहा…

aaj kal to baahar ki kampaniyan hi india me aa rahi hain baahar jaana jaroori bhi nahi.par baahar ki taknikiyon ko jaanne ke liye tulnaatmak drashti se kuch gyaanoparjan karna apne desh ki unnati ke liye behtar hai.aapka aalekh achcha hai.

SAJAN.AAWARA ने कहा…

jab zero diya mere bharat ne,
tab duniya ko ginti aayi.
taron ki bhasa bharat ne duniya ko pahle sikhlayi.
deta na dasmlave mera bharat to ,
un chand par jana muskil tha.
chand or dharti ki duri ka andaja lagana muskil tha.
sabhyta jahan pahle aayi,
pahle janmi hai jahan pe kala,
mera bharat wo bharat hai jiske piche sansaar chala.
sansaar chala or aage badha ,
age badh or badhta gaya.



hai preet jahan ki reet sada mein geet waha ke gata hun,
bharat ka rahane wala hun bharat ki baat sunata hun.
kale gore ka bhed nahi,
har dil se hamara nata hai.
hame or kuch na aata ho ,
par pyaar nibhana aata hai.

ghumne ke liye bahar jana buri baat nahi hai, lekin dusro ke bahkave me aakar apna nuksaan karakar jana bewkufi hai..
proper procedure ke tahat koi bhi bina nuksaan ke bahar jaa sakta hai...

phir bhi mere bharat ka jawab nahi..

jai hiond jai bharat

संध्या शर्मा ने कहा…

अपने देश अपने घर जैसा सुख सच में कहीं नहीं है, और ये बात महसूस करने की है, एक सुखद अहसास है, अपनों के बीच सुख दुःख बांटने का...
अच्छे विचार...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जो सुख शांति पैसा रिश्ते नाते रीती रिवाज आपस का भाई चारा भारत में मौजूद है | वह विश्व के किसी कोने में नहीं है

लाख टके की बात कही है आपने...ये मेरा विदेश यात्राओं द्वारा अर्जित किया हुआ अनुभव भी है,

नीरज

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

सही तथ्य पर प्रकाश डालती पोस्ट!

सादर

अरूण साथी ने कहा…

मुर्खों को कौन समझाए संजय भाई यहां तो लोग गांव और घर नहीं छोड़ना चाहता कोई ही कि देश ही छोड़ने को बेताब है...किसे पता है कि पैसे से सुख मिलता तो प्रेम जी अजीम और ब्रेफेट सब कुछ छोड़ नहीं देता...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

तथ्यपरक आलेख संजय भाई...
सार्थक आवाहन...
जयहिंद...
सादर...

mahendra verma ने कहा…

आपके विचार समर्थन योग्य हैं।
भारत में सारी सुख-सुविधाएं मौजूद हैं, फिर क्यों विदेश जाना ?

संजय भास्कर ने कहा…

@ संदीप भाई
ग़लतफहमी में है की विदेश जा कर ही बहुत सारा पैसा कमा सकेंगे विदेश जा कर ही नाम कमा सकेंगे

@ योगेश भाई
आपसे सहमत हूँ

@ भषण जी
आपसे सहमत हूँ

ajit gupta ने कहा…

व्‍यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में जाए, लेकिन खुली आँखे लेकर जाए। केवल भेड़-चाल से ना जाए। ठगी का शिकार भी ना हो। एक बात और समझ लेनी चाहिए कि वहाँ भी पैसा फोकट में बरस नहीं रहा है। वहाँ भी पाई-पाई जोड़कर ही मुठ्ठी भरी जाती है। वहाँ जाकर ही समझा जाता है कि वे कैसे पैसा कमाते हैं और कितनी मजबूरी से रहते हैं। आज भारत में इंजीनियर को 5-7 लाख का पेकेज आराम से मिल जाता है जबकि वहाँ 5हजार डालर से शुरुआत होती है। इस पर लगभग 40 प्रतिशत टेक्‍स कट जाता है। गुजारा कैसे चलता है ये वे ही जानते हैं। हमें केवल उनकी चकाचौंध दिखायी देती है।

रचना दीक्षित ने कहा…

आपकी यह सलाह खुद ब खुद पूरी हो जायेगी क्योंकि अब तो अमेरिका में भी एम्प्लोय्मेंट की स्थिति खराब हो चली है, वहाँ भी इस के लिये प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं. अगले दस साल में भारत की स्थिति दुसरे देशों की तुलना में कही बेहतर होगी विशेषकर रोजगार के मामले में.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

सुन्दर आलेख... देशभावना से ओतप्रोत... उदारीकरण और बाजारीकरण के दौर में ये भाव गौण हो रहे हैं...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! सूचनार्थ!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! सूचनार्थ!

Prakash Jain ने कहा…

भाई, हम तो कोई इच्छा नहीं रखते विदेश जाने की:-)

www.poeticprakash.com

Reena Maurya ने कहा…

bahut sahi baat kahi hai apne sanjay ji ...
hamare desh me har prakar ki suvidha hai to ham videsh ki taraf rukh kyu kare..
bahut hi accha lekh likha hai apne..

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

अपनी माँ कैसी भी हो...उसे छोड़ कर ज्यादा पैसे वाली...ज्यादा सुन्दर ...के पास तो रहने नहीं चले जाते....तो,फिर क्यूँ विदेशों की ओर भागा जाए...अपना देश छोड़ कर

Kailash C Sharma ने कहा…

अपना देश अपना ही होता है...बहुत सार्थक पोस्ट..

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

दूर के ढोल सुहाने लगते हैं।
..बढ़िया लिखा है।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

देश भक्ति की भावना अपनी जगह सही है ।

लेकिन विकसित देशों में भी कई चीज़ों की कमी है ।
जैसे ज्यादा आबादी , गंदगी , कानून तोड़ने की सुविधा , ट्रैफिक के नियमों में कोई ढील न होना आदि । अब ऐसे में हम वहां जाकर क्या करेंगे ! इन आदतों के रहते क्या हमारा मन लगेगा !

Deepak Saini ने कहा…

यार, इतने सुन्दर सुंदर फोटो दिखाओगे तो किसी का मन विदेस में जाने को करने लगेगा

@ क्योकि जो प्यार और अपनेपन की भावना भारत देश
में है और कहीं भी नहीं है

कुछ बात है के हस्ती मिटती नहीं हमारी
बरसो रहा दुसमन दौरे जहाँ हमारा


आभार

Deepak Saini ने कहा…

यार, इतने सुन्दर सुंदर फोटो दिखाओगे तो किसी का मन विदेस में जाने को करने लगेगा

@ क्योकि जो प्यार और अपनेपन की भावना भारत देश
में है और कहीं भी नहीं है

कुछ बात है के हस्ती मिटती नहीं हमारी
बरसो रहा दुसमन दौरे जहाँ हमारा


आभार

ASHA BISHT ने कहा…

सार्थक रचना ..अच्छे विचार ..

दीपक 'मशाल' ने कहा…

Dunia ke kisi bhi desh me zanme vyakti ko apne desh aur khaskar us mitti se gahra judaav hota hai jisme uska bachpan beeta..
har jagah ki apni-2 achchhaiyaan-buraaiyaan hain.
kai saare mahatvapoorn pahluon, kadwi sachchaaiyon ko andekha kar likha gaya emotional aur ek tarfi post lagi..
fir bhi aapke jazbe ki sarahna karta hoon..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कई बार लोग स्वेच्छा से विदेश नहीं जाते बल्कि उनकी कम्पनी ही उन्हें वहां भेजती है, जो कि अब मल्टी नेशनल कम्पनियों के भारत आगमन के बाद बहुत आम हो गया है.
फिर भी कोशिश देश में रहने की ही की जानी चाहिये.बढिया आलेख.

"पलाश" ने कहा…

बहुत अच्छा और स्प्ष्ट लेख ,विचारणीय तथ्य

dheerendra ने कहा…

संजय जी,..सबसे प्यारा देश हमारा,
बहुत ही सुंदर पोस्ट,पसंद आया ..
मेरे नए पोस्ट में स्वागत है....

M VERMA ने कहा…

लाख टके की सलाह ...
तथ्यात्मक

Anil Avtaar ने कहा…

सही कहते हैं संजय जी.. आपके अंतिम वाक्य दिल तक पहुंची.. धन्यवाद....

Amrita Tanmay ने कहा…

अक्षरश: सहमत हूँ..सार्थक आलेख.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसां।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

रजनीश तिवारी ने कहा…

लोग जाते है और आकर्षण तो है ही पर बाहर जाकर ही समझ में आता है , अपनी माटी याद आती है कि अपने घर अपने देश जैसा और कहीं नहीं ।

pragya ने कहा…

बिल्कुल सही कहा संजय जी, इसमें कोई शक नहीं है कि जो अपनापन और जीवन यहाँ भारत में है वो विदेशी भूमि पर कहीं नहीं है....जहाँ तक पैसे और नाम की बात है वो यहाँ रह कर कम खर्चे और अधिक प्यार में प्राप्त किया जा सकता है...

डॉ0 मानवी मौर्य ने कहा…

जरा विदेश में रह रहे भारतीयों से भी पूछिये, क्‍या उन्‍हें वही प्‍यार और सम्‍मान विदेशियों से मिलता है, जो अपने देश में मिलता है।

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ... कुछ बातों पर गंभीरता से विचार करना आवश्‍यक है ...आभार के साथ शुभकामनाएं ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

विदेश में रहता हूँ इसलिए इस विषय पे टिपण्णी करना उपुक्त नहीं लगता ...
वोसे लेख बहुत अच्छा है संजय जी ... और दुबई के चित्र तो लाजवाब लगाए हैं आपने ...

Anita ने कहा…

जाना ही है तो सीधे मार्ग से सम्मान के साथ जीने के लिये जाएँ तथा देश कभी नाम ऊँचा करें, सार्थक पोस्ट !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

सच!!! बहुत सुन्दर वाह!

SAJAN.AAWARA ने कहा…

bahut khub likha hai.

SAJAN.AAWARA ने कहा…

kabhi videsh nahi jaunga me

SAJAN.AAWARA ने कहा…

jai hind jai bharat

SAJAN.AAWARA ने कहा…

10000 coment ke liye bahut bahut badhaiyan...

jai hind jai bharat

SAJAN.AAWARA ने कहा…

aaj phir ek iljaam hamare sir aaya,
blog ke tendulkar ko dashjari banaya..
isi tarha satkon ke satak tum lagate chalo
hmesha khus raho or phulo phalo..

dher sari badhaiyan aapko...

jai hind jai bharat

Atul Shrivastava ने कहा…

उम्‍दा विचार।
सच कहा आपने भारत की भूमि में जो है वो किसी विदेशी जमीन में नही...फिर इस तरह का मोह बेकार है।
विदेश जाकर बसने वालों और कैरियर बनाने वालों को एक बात और ध्‍यान रखना चाहिए कि विश्‍व में भारत के अलावा और कोई देश नहीं है जिसे मां का दर्जा मिला हुआ है और उसकी माटी को लोग माथे पर लगाते हों..... यह सम्‍मान सिर्फ हमारी मातृभूमि का है.....

Deepak Saini ने कहा…

संजय भाई,

१०००० टिपण्णी के लिए बधाई

dheerendra ने कहा…

मेरे नए पोस्ट में स्वागत है...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अपने चार साल के विदेश प्रवास के बाद मैंने भी यही निष्कर्ष निकाला है.. लेकिन कुछ सचाई इन भावनाओं से भी ऊपर है!! उनको भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता!!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

एक सच्चे भारतीय के दिल की बात कह दी.बहुत ही सार्थक आलेख.

केवल राम : ने कहा…

समय और स्थिति के अनुसार जो सही है वही करें तो कोई बुराई नहीं ....!

Babli ने कहा…

में आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ! हमारे देश में जो आपस में प्यार और भावना है लोगों के प्रति वो विदेश में नहीं मिल सकता! ये बात सही है की पैसा ज़्यादा कमा सकते हैं पर बहुत अकेलापन है! आज विदेश में जो उपलब्ध है वो सब हमारे देश में भी है इसलिए मेरे ख्याल से लोग कोशिश ज़रूर करते हैं विदेश जाने के लिए पर जब दूसरों से सुनते हैं किस तरह से एजेंसि में पैसे देकर लोग अपना सब कुछ खो बैठते हैं फिर अपना इरादा बदल देते हैं ये सोचकर की हमारा देश महान है इसे हम छोड़कर नहीं जायेंगे! आपने सच्चाई को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.com/

amrendra "amar" ने कहा…

Sanjay Ji Namsakar,
Sabse pahle to badhai aapko ki aapne is mudde ko uthya , bikul sach kaha hai aapne ki jo prem aur sauhard ki bhavna hamare desh me hai wo kahi anyatra nahi hai . log paise ki lalach me chale to jate hai baher pr aaye din waha koi na koi durghetna sunne ko milti hai bhartiya mool ke logo ke saath, aise me agr koi samj jaye ki apna desh hi sabse acha hai kitni acchi bat hai
bahut bahut aabhar sanjay ji

mridula pradhan ने कहा…

पैसा तो कमा लेते है पर प्यार और अपनेपन की भावना को खो देते है |paisa kamane ke bad.....apnapan khone se pahle wapas aa jana chahiye.

Ankur jain ने कहा…

sach kaha...sare jahan se achcha hindostan hamara...

मनीष कुमार ‘नीलू’ ने कहा…

इस आलेख के जरिये पलायन को रोकने का प्रयास जो आपने दिखाया है वह सराहनीय है !
सही मुद्दा को उजागर करती सुन्दर आलेख के लिये धन्यबाद ..!

NISHA MAHARANA ने कहा…

जो प्यार और अपनेपन की भावना भारत देश
में है और कहीं भी नहीं है ..............!
बहुत ही अच्‍छा.

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपके पोस्ट पर आना सार्थक सिद्ध हुआ । पोस्ट रोचक लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । धन्यवाद ।

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बहुत बढ़िया सलाह उन्हें जो विदेश जाने के लिए कुछ भी करने तैयार बैठे रहते है|

Gyan Darpan

Vaneet Nagpal ने कहा…

नेक सलाह | विदेश में रह कर धन ज्यादा कमाया जा सकता है | ये गलतफहमी सबको है | मैं ये टिप्पणी कारपोरेट घराने को छोड़ कर आम आदमी के लिए कर रहा हूँ | आम भारतीय विदेश में जा कर कमाता तो डालर में है पर खर्च भारत के अनुसार करता है | यदि वो कमाता डालर में है तो खर्च भी डालर में करे | फिर देखे कि उसके पास बचता क्या है | वही आम भारतीय (जो विदेश में जा कर ज्यादा कमाने के इच्छा रखता है ) यहाँ भारत में ईमानदारी से आठ घंटे भी काम नहीं करना चाहता व विदेश में 12-12 घंटे काम करने को तैयार रहता है और कहता है कि मैं भारत से ज्यादा विदेश में कमा रहा हूँ |

टिप्स हिंदी में

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-694:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Suman Dubey ने कहा…

सजय जी नमस्कार बहुत सही कहा आपने हमारा देश परिपूर्ण है फिर भी देश की सेवा छोड़ लोग विदेश जाने के लिये किसी भी हद तक क्यो चले जाते है।देखे मेरी न्यी पोस्ट शब्द्कुन्ज पर्।

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

बहुत सुन्दर संजय जी भावुक कर देने वाला लेख ,....अपना देश अपनी माँ अपने ही हैं ..इस तरह का मुक्त वातावरण और प्यार दुलार ये संस्कृति ये तहजीब और कहाँ ??
भ्रमर ५

कविता रावत ने कहा…

"jo sukh chhaji ke chobre, wah balakh na bahare"
..jo sukh apne ghar mein apne desh mein wah bhala baahar kaise mil sakta hai..
saarthak prastuti ke liye dhanyavad.

चन्दन..... ने कहा…

बन्धुवर आपकी बात पूरी सही है| फिर भी हमारे कई घर ऐसे हैं जो विदेशों के पैसे से हि खाते पीते भी हैं और इस तरह से देश को विदेशी मुद्रा की भी आपूर्ति होती है जो की एक बहुत हि उत्कृष्ट सहयोग है हम भारतियों का भारत माँ के प्रति|और जब तक हम विदेशी सभ्यता और लोगों से रु बरु नही होंगे तब तक हम खुद की तुलना और सुधर की सम्भावना कैसे तलाशेंगे|

बहुत हि सुन्दर आलेख|

Babli ने कहा…

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/

एम सिंह ने कहा…

हमें अपनी सोच को विस्‍तार देना चाहिए. विदेशों में जाना किसी भी नज़रिए से गलत नहीं ठहराया जा सकता, गलत है अपने देश को भूल जाना या अपने देश की बदनामी करना, उसे कोसना.

एम सिंह ने कहा…

आपके ब्‍लॉग पर 10 हजार से अधिक टिप्‍पणियों के लिए बहुत बहुत बधाई.

Ravi Rajbhar ने कहा…

देर से आने के लिए माफ़ी चाहूँगा... .
एक बहुत ही गंभीर विषय पर अपने सार्थक लेख प्रस्तुत किया है..

Ravi Rajbhar ने कहा…

और भैया भास्कर ,
हल्दीराम की मिठाई के साथ आपको १०००० टिप्पड़ी का अद्भुत रिकार्ड
कायम करने के लिए बहुत बहुत बधाई..
अप ऐसे ही नित नई उचाई को छूते रहें ..

अभिषेक प्रसाद 'अवि' ने कहा…

Sanjay... sabse pahla ek sawaal... kya aadmi pasie kamaane apne ghar ko chhod kar bahar nahi jata? delhi ka example le lo... roj hajaron log yahan apna ghar chhod kar aate hai... fir videsh jane mein kya burayi hai? aur agar videsh ja kar dhan kamaane mein koi burayi hai to mere khyaal se desh mein rah kar apna kunba chhodne mein v burayi hai.. bhayi sidhi si baat hai aap ghar se 10 km door raho ya 10 hajar km... baat ek hi hai.. aap ghar se bahar hi ho... aur sabhi paise kamaane k liye hi ghar se bahar kadam rakhte hai... rahi baat yahi rah kar naam aur paisa kamaane ki to sanjay log bahar ka rasta tab apnate hai jab unhe ghar mein wo opportunity nahi milti... warna shayad hi aisa koi hoga jo ghar chhode... yahaan jitni mehnat log karte hai uske aadhi mehnat ka dugna laabh milta hai bahar... aur agar kuvhh yuva thage ja rahe hai to uske liye kasoor vaar wo khud hai... har cheej aaj k yuva ko aasaani se chahiye... aasaani se mili vastu labhprad kabhi kabhi hi hoti hai, mera personal experience hai... tulna karein pahle dono jagah rahne wale samaan mehnat karne walon ke beech fir aapko jawaab mil jayega... waise aapki bhaavnaon ki kadra karta hun... aalekh jaroor achha tha...

SHASHI PANDEY ने कहा…

संजय जी आप का ये संदेश आज की पीढ़ी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.बधाई.

Arvind Jangid ने कहा…

बहुत ही प्रेरणादाई लेख !

"पढ़े लिखे नौजवानों कि मजबूरी देखिये,
बारह सौ रियाल में मार उडारी देखिये.

रोजगार के लिए जाना पड़ता है, मगर ये भी सच है कि परिवार के लिए कितना दुखी कर देने वाला होगा ये कदम. वैसे ज्यादा तो नहीं जानता मगर ये भी सच है कि विदेशों में Talent कि कदर तो है. अगर ये प्रतिभा को भारत में ही मौका मिले तो भला कोई क्यों जायेगा. आभार.

Udan Tashtari ने कहा…

अपनी मातृ भूमि से पूरा प्यार है...दूर हो जाने की कसक भी...उसका संपूर्ण सम्मान भी..फिर भी आपके आलेख से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता...

देश प्रेम, देश की सेवा- सब सही ही कहा है आपने किन्तु आलेख और विश्लेषण मांगता है ..चंद पंक्तियों में इसे समेटना उचित नहीं.

ब्रेन ड्रेन- सही कारण और निवारण, पैसों की लालसा, सुविधाओं के प्रति लोलुपता- सभी अपने आप में पूरा विषय हैं- एक पूरे उपन्यास का मटेरियल चन्द पंक्तियों में समेट देने भला कहाँ संभव मित्र...

विषय उत्तम लिया है निश्चित ही.

Vijai Mathur ने कहा…

आपका यह लेख प्रेरणास्पद है।

आशा जोगळेकर ने कहा…

जाना चाहिये । हम अगर सही तरीके से संपन्न देशों की संपत्ती में से अपना हिस्सा लेते हैं तो क्या गलत है । भारत में अगर हर मोड पर आप को गलत काम किये बिना रिश्वत दिये बिना कुछ भी करना संभव नही है तो जो जा सकता है वह तो बाहर जाये । ताकि यहां स्पर्धा थोडी कम हो लोक संख्या थोडी कम हो ।

आशा जोगळेकर ने कहा…

भारतीय का मन तो कहीं भी रहे भारतीय ही रहता है ।

आशा ने कहा…

बहुत अच्छा लेख अच्छा मुद्दा उठाया है
बधाई
आशा

Maheshwari kaneri ने कहा…

बिल्कुल सही कहा... बहुत सार्थक और प्रेरणास्पद आलेख!

shashi purwar ने कहा…

bahut ki badhiya ........umda post .

सोनरूपा विशाल ने कहा…

completely agreed !

संजय भास्कर ने कहा…

आप सभी ने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं !

संजय भास्कर

Mamta Bajpai ने कहा…

जी हाँ आप सही कह रहे है ..सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं जाना चाहिते ..अगर कुछ नया सीखना है जाओ ..पर लोट कर आने की आस भी रखो

Suman Anuragi ने कहा…

par aaj kal to pyaar paise par depend ho gya hai.. uska kya.???

Babli ने कहा…

मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
http://seawave-babli.blogspot.com

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

prerak,sachchaiparak lekh.

Jyoti Mishra ने कहा…

Lovely read..
Foreign is good for temporary visits... India is far better no matter wat :)

Amrita Tanmay ने कहा…

फिर से पढ़ा ..बढ़िया आलेख

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

:) kah to denge ki videsh jane ki koi jarurat nahi ........ par jo videsh me hain, wo kahenge angoor khatte hain:D

संजय भास्कर ने कहा…

आप सभी ने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं !

संजय भास्कर

Sunil Kumar ने कहा…

एक जरुरी पोस्ट, आँखें खोलने में सक्षम आपका आभार

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

Ab to sochna padega...

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

26/11/2011को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

sanjay ji...bigat kai dino se aapke behtarin sms mobile per padhkar lutf uthath raha..pichle mahine bed rest per tha dengu ki bajah se..blog jagat se door..aaj karib mah bhar baad aapka lekh padha ..logon ke bichar sune..main to sirf itna kahunga ki yadi kisi ks drawing room bahut khoobsurat bhi ho to kya ham usi me baithe rahenge..are hame apne bhi to theek karna hai..hamara kamaya hua paisa sirf passbook ki ek digit hai..aksar karono ki dhanrashi un samasyano ka nidan nahi kar paate to maa pyaar se baalo ko sahlakar sirf kah deti hai ki ham hain na..se door ho jaati hai..dharti ki jab utpatti hui tab na america tha na britain...ye to logon ne use damkaya chamkaya hai..bhartiya bhool jaaate hain ki jo unke paas hai wo duniya me kahin nhai..aaj sari duniya ko bhartiyon ne roshan kiya hai..lekin apne desh ko nah kar pa rahe hain..chattis garh bihar ka ek majdoor delhi bombay me khoobsurat imarat bante hue delhi bombey ka lutf uthata hai..jab tak delhi sanwar nahi jaayegi delhi wale majduron ko eun hi pralobhan denge..chattigariha chattisgarh me delhi ke geet hi gayega..lekin jab sab ban jaayega tab..tab bhagaye jaayenge tab jo sthiti hogi wo kitni karunaprad hogi...

anju(anu) choudhary ने कहा…

बेहतरीन सोच....कायम रहना संजय जी

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बढिया सलाह है संजय जी.

निर्मला कपिला ने कहा…

भारत से अगर भ्रश्टाचार खत्म हो जाये और सब काम कानून के दायरे मे होने लगें तो कौन विदेश भागेगा। जो एक बार बाहर जाता है उसे लगता है कि वहाँ सब काम छोटे से बडे अपने आप होते हैं व्यर्थ की भाग दौद नही हर सहूलियत सब को एक बराबर मिलती है तो उनका आकर्षण विदेश की ओर हो जाता है। वाकई जो सुख छजू के चौबारे वि न बल्ख न बुखारे । अपने देश मे ही दिल लगता है। कुछ लोग मजबूरी मे रोज़ी रोटी के लिये भी जाते हैं। अच्छा आलेख। शुभकामनायें।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत ही प्रेरणादाई लेख.. अच्छा मुद्दा उठाया है!

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बात तो सही है कि लोग भारत से बहार जाकर पैसा कमाना चाहते भले इसके इसके लिए कोई भी काम वहाँ जाकर करते हैं. इतनी मेहनत यहाँ भी करें तो सम्मान और पैसा कमा सकते हैं. हम भारतीय खुद को सुधार लेंगे तो देश अपने आप सुधर जाएगा.

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

संजय भाई काफी अच्छा लगा आपका ये प्रेरणादायक आलेख .........

dheerendra ने कहा…

संजय जी,
बहुत दिनों से आपके नए पोस्ट के इंतजार में,...
मेरे नए पोस्ट पर आइये,....

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA ने कहा…

बढ़िया लेख!

Point ने कहा…

बिल्कुल सही कहा

prritiy---------sneh ने कहा…

sahi baat kahi hai, prastutikaran achha hai.

shubhkamnayen

प्रणय ने कहा…

भावना अच्छी है.. लेकिन ह्रदय से ज्यादा प्रभावित है...क्या सभी सिर्फ पैसे कमाने जाते है...शायद नहीं ...हम इमानदारी से नहीं जी सकते... जितना मर्ज़ी जोर लगा लें, कोई भी काम करवाना हो , रिश्वत दो, कोई भी चीज़ लेनी हो , हर चीज़ में मिलावट. और अगर हम सब से ये कहने की कोशिश करें , की ये गलत है, लोग हमें ही पागल समझते हैं.... क्या आपको लगता है, की बड़े वैज्ञानिक अछे इंजिनियर सिर्फ पैसे के लिए जाते हैं...कई जाते होंगे, सब नहीं जाते

चन्दन भारत ने कहा…

बहुत हि सार्थक और युवाओं को दिशा दिखाने वाला लेख ..भाई साहब सच तो ये है कि जो लोग यहाँ से जाते हैं उन्हें भी ये पता है पर वो देखा देखि के शिकार हो गए हैं और जब तक उन्हें इन सच्चाइयों का भान होता है वो बहुत हि बुरी तरह से विदेशों के जाल में फंस जाते हैं...

Akash Mishra ने कहा…

पंकज उधास का 'चिट्ठी आयी है' और दिलवाले दुल्हनिया ले जायेगे का 'घर आ जा परदेशी' याद आने लगे
कुछ टंकण की त्रुटियों को छोड़ दें तो बेहद उम्दा लेखन और बहुत सार्थक विषय |

सादर

राज चौहान ने कहा…

बहुत अच्छा और स्प्ष्ट लेख ,विचारणीय तथ्य

Unknown ने कहा…

भावना अच्छी है.. लेकिन ह्रदय से ज्यादा प्रभावित है...क्या सभी सिर्फ पैसे कमाने जाते है...शायद नहीं ...हम इमानदारी से नहीं जी सकते... जितना मर्ज़ी जोर लगा लें, कोई भी काम करवाना हो , रिश्वत दो, कोई भी चीज़ लेनी हो , हर चीज़ में मिलावट. और अगर हम सब से ये कहने की कोशिश करें , की ये गलत है, लोग हमें ही पागल समझते हैं.... क्या आपको लगता है, की बड़े वैज्ञानिक अछे इंजिनियर सिर्फ पैसे के लिए जाते हैं...कई जाते होंगे, सब नहीं जाते