20 जून 2014

....... दिन में फैली ख़ामोशी :))

चित्र - ( गूगल से साभार )

जब कोई इस दुनिया से
चला जाता है
वह दिन उस इलाके के लिए
बहुत अजीब हो जाता है
चारों दिशओं में जैसे
एक ख़ामोशी सी छा जाती है
दिन में फैली ख़ामोशी
वहां के लोगो को सुन्न कर देती है
क्योंकि कोई शक्श
इस दुनिया से
रुखसत हो चुका होता है........!!


(C) संजय भास्कर 

09 जून 2014

........ तेरे डिब्बे की वो दो रोटियाँ :)

( चित्र - गूगल से साभार ) 

तेरे डिब्बे की वो दो रोटियाँ..
कहीं बिकती नहीं..
माँ, महंगे होटलों में आज भी..
भूख मिटती नहीं...!

ये पंक्तियाँ मझे Mother's Day पर SMS में मिली, काफी दिनों से व्यस्त होने के कारण ब्लॉगजगत से दूर था आज समय मिला तो आप सब से साँझा कर लीं !


-- संजय  भास्कर  

03 मई 2014

वक्त के साथ चलने की कोशिश -- वन्दना अवस्थी दुबे :)

ब्लॉगजगत में वन्दना अवस्थी दुबे एक जाना पहचाना नाम है (अपनी बात -- वक्त के साथ चलने की लगातार कोशिश है वंदना जी की ) से प्रभावित है ! वंदना दुबे जी के लेखन की जितनी भी तारीफ की जाए कम है ....हमेशा ही संवेदन शील विषय पर किस्सा कहानी हमेशा ही दिल को छूकर गुजरता है और हमेशा ही कुछ नया और छाप छोड़ता हुआ विषय चाहे कोई भी हो शब्द बनते चले जाते है  क्योंकि उनका मानना है वक्त के साथ ही चलने में भलाई है और मुझे तो हमेशा ही उनकी हर पोस्ट से एक नई प्रेरणा मिलती है..........!!!


एक लम्बे समय से मैं वंदना दीदी के ब्लॉग पढ़ रह हूँ परिकल्पना समारोह लखनऊ में उनसे मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ था और उनसे मिल कर बहुत प्रभावित हुआ और आज समय मिलते ही सोचा वंदना जी के बारे में कुछ लिखा जाये
क्योकि उनके लिखने का अंदाज ही ऐसा है कि पाठक अपने आप ही उनके ब्लॉग पर खिंचा चला आता है....उनके लेखन ने हमेशा ही प्रेरणा मिली है  ब्लॉगजगत को प्रभावित किया है और उनके अपार स्नेह के कारण ही आज ये पोस्ट लिख पाया हूँ...!!!

वंदना दुबे जी की एक पुरानी रचना दो घड़ी का सन्नाटा ,हम कहाँ से पायें? की कुछ पंक्तिया साँझा कर रह हूँ.............!!

मुट्ठी भर दिन
चुटकी भर रातें,
गगन सी चिंताएँ,
किसको बताएं?
जागती सी रातें,
दिन हुए उनींदे,
समय का विलोम
कैसे सुलझाएं?
भागती सी सड़कें,
खाली नहीं आसमान,
दो घड़ी का सन्नाटा ,
हम कहाँ से पायें ?

वंदना दीदी की लेखनी से प्रभावित होकर ही आज उनके के बारे में लिख पाया हूँ ...पर शायद किसी के बारे में लिखना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि है......!!

सुंदर लेखन के लिए वंदना दीदी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ........!!


(C) संजय भास्कर

21 अप्रैल 2014

अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती -- संजय भास्कर



अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती। शहर में आजकल वो बात ही नहीं पर पर अभी कुछ साल पहले तक जब  भी जब गाँव जाता था देखा करता था हर सुबह दादी और चाची आंगन में चावल साफ़ करती है  तो आंगन की मुंडेर पर कुछ गौरैया अपने आप ही मंडराने लगती है और चाची के थाली लेकर हटते ही गौरैया आंगन में बिखरे चावलों पर टूट पड़ती थी पर अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती !
बटेर अब कभी-कभार ही दिखते है। वनों की कटाई और वन क्षेत्र में बढ़ते मानवीय दखल से पंछियों की दुनिया प्रभावित हुई है और पंखों वाली कई खूबसूरत प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है ! 
'मसूरी की पहाड़ियों की सैर करने वाले सैलानियों के लिए बटेर एक खास आकर्षण होती थी। अब कभी कभार ही यह बटेर नजर आती है। यह लुप्त होती जा रही है। हर घर के आंगन में गौरैया को फुदकते हुए देखा जाता था। आज गौरैया नजर नहीं आती....!!!


( c)  संजय भास्कर 



02 अप्रैल 2014

.............कल्पना नहीं कर्म :))

कल शाम जब मैं अपने ऑफिस से घर के लिए निकला तो देखा एक कॉफी शॉप पर कुछ युवा मदहोश होकर धूम्रपान कर रहे है व नशे में डूबे हुए है तथा थोड़ी ही देर में एक दूसरे को गलियां  देने लगे व मार पीट पर उतर आये 
जो कुछ देर पहले तक एक दूसरे के साथ मदमस्त थे वही एक दुसरे को मारने पर उतारू है यह सब देख कर यह छोटी सी कविता लिखी है.........उम्मीद है आपको पसंद आएगी  !!!
चित्र :- ( गूगल से साभार  )
कॉफी हाउस में बैठा
आज का युवा वर्ग
मदहोश , मदमस्त, बेखबर
कर्म छोड़ कल्पना से
संभोग करता हुआ
निराशा को गर्भ में पालता हुआ
मायूसियो को जन्म दे रहा है
तो ऐसे कंधो पर
देश का बोझ
कैसे टिक पायेगा ? जो
या तो खोखले हो गये है
या जिनको उचका लिया गया है
ए - दोस्त -
बाहर निकलो इस संकीर्ण दायरे से
कल्पना को नहीं कर्म को भोगो
अपने कंधे मजबूत करो
इन्ही कंधो को तो
यह देश यह समाज निहारता है
अपनी आशामयी, धुंधली सी
बूढी आँखों से...........!!!

(c) संजय भास्कर