05 फ़रवरी 2010

कहीं ऐसा तो नहीं


 


कहीं ऐसा तो नहीं की 
हम इस दुर्लभ जीवन के 
अनमोल  क्षणों  को 
गवा रहे है 
दुनिया की चकाचौंध  
तो क्यों न हम 
स्वयं मै झांके 
की हम कितने पानी मैं है |
कैन ऐसा तो नहीं की 
हम अटक गए है 
आलस्य  मै , परमद मै 
और भूल बैठे है 
अपने  ध्येय को अपने कर्त्तव्य को 
तो क्यों हम पहचाने 
समय की महता को 
मेहनत की गरिमा को 
और हमारे कदम बढ उठे 
सृजन के पथ पर .......
नई मंजिल की ओर...............