30 जनवरी 2010

फंदे पर क्यों झूल रहे हैं मासूम



किशोर उम्र के बच्चों द्वारा की जा रही आत्महत्या किसी के भी जीवन का अत्यंत दुखद हिस्सा है। दुर्भाग्य की बात यह कि जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आत्महत्या की जाती है, उसे देखने या पाने के लिए वह जिंदा नहीं रहता, बल्कि मृतक के माता-पिता और परिवार वाले जिस मानसिक पीड़ा व पश्चाताप से गुजरते हैं, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
हाल ही में मुंबई में किशोर उम्र के बच्चों द्वारा जान देने की कई घटनाएं घटी। यह समझ के परे है कि अत्यंत क्षुद्र कारणों के चलते ये बच्चे अपनी जान पर खेल गए।
इसके लिए जिम्मेदार हैं हम, हमारा परिवार, शिक्षकगण और पूरा समाज। हम हमेशा हर बात या वस्तु के लिए चरम उत्कंठा तक की चाहत रखते हैं। चाहे वह धन-दौलत हो, प्यार हो, प्रसिद्धि हो या फिर पदोन्नति या फिर कुछ और। अंधी प्रतियोगिता में हम सब बिना सोचे-समझे दौड़ रहे हैं। शैक्षणिक, खेल, उद्योग-व्यापार नौकरी आदि-आदि क्षेत्रों में हम अपनी जगह बनाने के लिए भारी तनाव में जीते रहते हैं।
एक ढाई साल के बच्चे की मां यह अपेक्षा करती है कि उसका बच्चा अंग्रेजी  बोले और पढ़कर दिखाए । मां-बाप अपने बच्चों को इन सबको सिखाने के लिए खुद भी तनाव झेलते हैं और बच्चों को भी उसी में ढाल देते हैं।  ऐसे मां-बाप चाहते हैं कि बच्चे स्कूल की हर प्रतियोगिता, हर परीक्षा में सिर्फ और सिर्फ प्रथम आएं। जरा-सा भी कम नंबर मिलने पर ये मां-बाप अपने बच्चों से अपराधी जैसा व्यवहार करते हैं।
दूसरी तरफ इन स्कूलों के समूह भी इस व्यवहार में शामिल हो जाते हैं। सबसे टाप पर रहने के लिए स्कूल प्रशासन शिक्षकों पर लगातार दबाव बनाते हैं। शिक्षक इसी दबाव को आगे बढ़ाते हुए विद्यार्थियों पर थोप देते हैं। अपेक्षाओं को पूर्ण न करने वाले या खरा न उतरने वाले विद्यार्थियों पर अपमानजनक टिप्पणियों की बौछार की जाती है और इससे ये बच्चे भारी मानसिक तनाव से गुजरने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
इन सबके बीच एक बार भी बच्चे को असफलता का सामना करने के लिए तैयार होने की बात नहीं की जाती। लिहाजा, जब बच्चा पहली बार असफल होता है तो वह विवेकशून्य हो जाता है। उसका दिमागऔर दिल असफलता को हजम नहीं कर पाता, लिहाजा उनके दिमाग में आत्महत्या जैसे विकल्प ही आ पाते हैं।