05 जनवरी 2010

स्टूडेंट नहीं लग रहे आमिर खान

कई समीक्षकों के पास शब्द नहीं हैं कि वे 3 इडियट्स की तारीफ कर सकें। कइयों ने इस फिल्म की तुलना शोले से कर दी। मैं समीक्षक तो नहीं, लेकिन एक दर्शक जरूर हूं। आमिर खान की फिल्में अच्छी लगती हैं, इसलिए 3 इडियट्स भी अच्छी लगी। मैंने आमिर खान की ही फिल्म तारे जमीं पर भी देखी थी। जब मैं 3 इडियट्स देख रहा था तो मुझे लगा कि यह फिल्म जैसे कि तारे जमीं पर का ही सीक्वेल हो। और सीक्वेल कभी पहली फिल्म से अच्छा नहीं होता। मेरी नजर में 3 इडियट्स, तारे जमीं पर से बेहतर नहीं है। यह बात नहीं है कि इसमें कोई संदेश नहीं है। दोनों ही फिल्में हमारी शिक्षा प्रणाली पर कड़ा प्रहार हैं।
अगर बात करें 3 इडियट्स की, तो सभी कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है। बोमन इरानी का तो जवाब नहीं। मुझे शरमन से इतने बेहतर काम की उम्मीद नहीं थी, लेकिन यहां तो उम्मीद से दोगुना अच्छा था। आर माधवन की तो जितनी भी तारीफ की जाए, कम है। लेकिन आमिर खान एक स्टूडेंट नहीं लग रहे(यह मेरा निजी नजरिया है)। आमिर खान एक छात्र होने के बावजूद कक्षा में पढ़ाते हैं तो लगता है कि वे अध्यापक ही हैं। उनके हाव-भाव और उनके विचार एेसे हैं, जैसे कि उनका किरदार बहुत परिपक्व है। इस फिल्म का नाम? फिल्म में कहीं भी एेसा नहीं लगता कि तीनों को इडियट समझा जाए। आमिर खान का किरदार हर साल टॉप करता है, तो इडियट कहे जाने का मतलब ही नहीं। खैर, विधु विनोद चोपड़ा, राजकुमार हिरानी और आमिर खान जैसे बॉलीवुड के सितारों ने अपना शत-प्रतिशत दिया है। इसके लिए हम उनके धन्यवादी हैं। एेसी ही फिल्में अगर बनती रहेंगी तो सामाजिक बदलाव संभव है। तारे जमीं पर देखने के बाद कई लोगों की मानसिक धारणा बदली थी कि इग्जाम में नंबर लाना ही महत्वपूर्ण नहीं होता। अगर वही लोग 3 इडियट्स भी देखेंगे तो यह धारणा पक्की हो जाएगी।

कहीं नजरें न तरसें पंछियों की एक झलक को










अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती।
बटेर अब कभी-कभार ही दिखते है। वनों की कटाई और वन क्षेत्र में बढ़ते मानवीय दखल से पंछियों की दुनिया प्रभावित हुई है और पंखों वाली कई खूबसूरत प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
'मसूरी की पहाड़ियों की सैर करने वाले सैलानियों के लिए बटेर एक खास आकर्षण होती थी। अब कभी कभार ही यह बटेर नजर आती है। यह लुप्त होती जा रही है। हर घर के आंगन में गौरैया को फुदकते हुए देखा जाता था। आज गौरैया नजर नहीं आती।





पंत की रचनाओं में समाया है एक पूरा युग



मौजूदा उत्तराखंड के अल्मोडा जिले की खूबसूरत वादियों में पैदा हुए सुमित्रानंदन पंत के दिलो-दिमाग में प्रकृति की सुंदरता कुछ इस कदर समाई कि ताउम्र उनकी संगिनी बन कर रह गई। हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाने वाले सुमित्रानंदन पंत प्रकृति प्रेमी थे।
20 मई 1900 को पैदा हुए पंत की ज्यादातर रचनाएं प्राकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेरती नजर आती हैं। मशहूर साहित्यकार जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और रामकुमार वर्मा के समकालीन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं जिनका प्रकृति चित्रण इन सबमें सबसे बेहतरीन था।
आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत की रचना और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानेमाने साहित्यकार और हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव कहते हैं कि पंत अंग्रेजी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रह कर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे। जन्म के महज छह घंटे के भीतर अपनी मां को खो देने वाले पंत के बारे में यादव ने बताया कि पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। उन्होंने बताया कि पंत ने महात्मा गांधी और कार्ल मा‌र्क्स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएं लिख डालीं।
हिंदी साहित्य के विलियम वर्डस्वर्थ कहे जाने वाले सुमित्रानंदन पंत के बारे में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय [जेएनयू] में हिंदी साहित्य के प्रोफेसर देवेन्द्र चौबे ने बताया कि उन्हें प्रकृति के सुकुमार कवि के तौर पर जाना जाता है। महानायक अमिताभ बच्चन को अमिताभ नाम देने वाले सुमित्रानंदन पंत के बारे में चौबे ने बताया कि पद्मभूषण, ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था।
संस्कृतनिष्ठ हिंदी लिखने के लिए मशहूर सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख रचनाएं वीणा, लोकायतन, चिदंबरा और बूढा चांद आदि थीं लेकिन उनकी सबसे कलात्मक कविताएं पल्लव में संकलित हैं। यह 32 कविताओं का संग्रह है। जन्म के कुछ ही घंटों बाद अपनी मां को खो चुके पंत को उनकी दादी ने पाला पोसा और उनका नाम गुसाई दत्त रखा।
हरिवंश राय बच्चन और श्री अरविंदो के साथ जिंदगी के अच्छे खासे दिन बिता चुके पंत के बारे में चौबे ने बताया कि आधी सदी से भी ज्यादा लंबे उनके रचनाकर्म में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है। 
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