30 नवंबर 2009

इक अपने ने  भुला दिया  तो क्या गुनाह किया !

एक अपने ने रुलाया दिया तो क्या गुनाह किया , अरसा हुआ किस मुस्कराहट की झलक देखे , सदिया बीत गई चिडियो की चहक देखे , हमारे अपनों ने रुलाया है हमे , एक अपने ने मुह फेर लिया तो क्या गुनाह किया जिंदगी ने किया है हँसी मजाक हमसे , एक अपने ने कर लिया तो क्या गुनाह किया , ज़माने ने रुलाया है हमको , एक अपने ने रुलाया दिया तो क्या गुनाह किया तन्हाई में कोई नही है हमसफ़र मेरा , ज़माने ने जुदा किया है हमको इक अपने ने भुला दिया तो क्या गुनाह किया

26 नवंबर 2009

मीठे पर लोगो की गलतफहमियां

आधी-अधूरी जानकारी रखना नुकसानदेह हो सकता है।
विशेषकर तब जबकि आपको अपने भोजन के बारे में फैसला लेना हो।
वस्तुत: मीठे के संदर्भ में लोगों के मध्य कई गलतफहमियां व्याप्त है,
जिन्हे दूर करना जरूरी है। मिथ: वजन घटाने के लिए सभी मीठी खाद्य वस्तुओं से परहेज करना चाहिए! तथ्य: इस गलत धारणा से अनेक लोग ग्रस्त है।
खासकर किशोर-किशोरियां कुछ ज्यादा ही। सच तो यह है कि सामान्यत: वजन तभी बढ़ता है, जब हम विभिन्न खाद्य पदार्थो के जरिए जरूरत से ज्यादा कैलोरीज ग्रहण करते है। जितनी कैलोरीज आपका शरीर जलाता है यानी इस्तेमाल करता है, उससे अधिक कैलोरी ग्रहण करने से आपके वजन के बढ़ने
की संभावनाएं बढ़ जाती है।
सच तो यह है कि खान-पान की गलत आदतें वजन बढ़ाने में सहायक है, न कि मीठा।
फ्रॉम
डॉ. काजल पंडया
सीनियर न्यूट्रीशनिस्ट

24 नवंबर 2009

जीना है तो तेरी मरजी, नही तो मरजा....

बामुलाज़ा होशियार खबरदारमहंगाई हो चुकी है
असरदारआटा होगा बीस का किल्लोसोच-सोच
घबराए बिल्लोचावल कौन-सा कम
हैमिसेज शर्मा को तो यही गम हैदाल
तो पहले ही खा चुकी है
भावफ्राई, मखनी खाने के धरे रह गए चावहोने वाली है
चीनी चालीस पारक्या पकाओगे और फ़िर क्या खाओगे
बरखुरदारपीएम साब बोले,
तैयार रहना मेरी प्रजासब्जी के लिए लेना पड़ सकता है
कर्जा जीना है तो तेरी मरजी,
नही तो मरजा....
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

19 नवंबर 2009

दोस्ती सच्ची हो तो वक्त रुक जाता है !

दोस्ती सच्ची हो तो वक्त रुक जाता है ,
आसमा लाख ऊँचा हो मगर झुक जाता है ,
दोस्ती में दुनिया लाख बने रुकावटे ,
अगर दोस्ती सच्ची हो तो ,
खुदा भी झुक जाता है !

18 नवंबर 2009

मेरा घर कब्जाना चाहते हैं !


मेरा घर कब्जाना चाहते हैं कभी चीनी तो कभी पाकिस्तानी भाई बनकर मेरे हाथ बंधे हैं मैं क्या करूं कैसे लडूं इनसे मैं मैं बेचारा भारत चाहता हु सबका भला कभी पहल नही करता अब तो दूज करना भी भूल गया हूँ पर घर तो मुझे बचाना ही है ये तो मेरा खजाना ही है पर मैं करू तो क्या वो मेरा घर कब्जाना चाहते हैं मेरे भाई बनकर
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

17 नवंबर 2009

खूब हंसो हँसना ही जिंदगी है !

हंसें और खूब हंसें। अगर आप ध्यान लगाना चाहते हैं तब तो और भी हंसें, क्योंकि यह ध्यान की पहली सीढ़ी है। हो सकता है कि आपको यह पढ़कर कुछ ताज्जुब हो, लेकिन विशेषज्ञों का यही मानना है। यदि आप ध्यान का अभ्यास करना शुरू करते हैं, तो सबसे पहले इधर-उधर भटक रहे मन को एकाग्रचित करना होता है। जब हम हंसते हैं, तब भी सब कुछ भूल कर एकाग्रचित हो जाते हैं। बीते दिनों की पीड़ा पीछे छूट जाती है। हंसते समय हमारा दिमाग तनावमुक्त होकर सिर्फ वर्तमान पर केंद्रित हो जाता है। हमारा शरीर, संवेदना और आत्मा भी इस क्रिया में सम्मिलित हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति सुबह के समय हास्य ध्यान योग का अभ्यास करता है, तो वह दिन भर प्रसन्न रह सकता है। यदि शाम को इसका अभ्यास किया जाए, तो न केवल रात को अच्छी नींद आती है, बल्कि सुखद सपने भी आते हैं। मन की शक्ति का प्रयोग हास्य योग गुरु जितेन कोही कहते हैं कि हंसना भी योग है। जहां हास्य का अर्थ है मन की ऊर्जा को बढ़ाना, वहीं योग का मतलब होता है जोड़ना। इसलिए ये दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।
हंसने के कई फायदे हैं। इससे सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। हमारे मस्तिष्क को बहुत अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत होती है। हंसने से बड़ी मात्रा में हवा शरीर के अंदर चली जाती है। इस क्रम में फे फड़ों का भी व्यायाम हो जाता है

16 नवंबर 2009

काश! कोई तो समझ पाता मेरे दिल के हालात् !

काश! कोई समझ पाता मेरे दिल के हालात् ! कैसे कहूँ? हैं लफ्ज़ नहीं ................... कहने को.................. ॥ एक दिन था कि हसीँ लगती थी दुनिया सारी यह चिलचिलाती धूप भी, हमें लगती थी प्यारी॥ आज तुम नहीं तो कुछ नहीं, सारी दुनिया ही बेकार है यह ज़िन्दगी रही ज़िन्दगी नहीं, अब तो यह ज़िन्दगी बेज़ार है॥ तुम्हारे न होने से ,काटने को दौडे यह चांदनी,
रो पड़ता हूं कभी कभी ,
जब आती हैं यादें पुरानीदिल तो रो रहा है,
पर आँसू बहते ही नहीं ,
शायद वे भी समझ न सके ,
मेरे दिल के हालात् ॥ बंद करता है 'महफूज़ '
अपनी कलम अब यहीँ,
कोई पैगाम हो तो भेजना,
ग़र समझ सको तो समझ लेना,
मेरे दिल के हालात् ॥ ॥ ॥
हमारे मित्र महफूज़ अली के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

12 नवंबर 2009

शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है

आजादी के छह दशक से अधिक समय गुजरने के बावजूद आज भी देश में सबके लिए शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है। देश में भले ही शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कवायद जारी है, लेकिन देश की बड़ी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने के मद्देनजर सभी लोगों को साक्षर बनाना अभी भी चुनौती बनी हुई है। सरकार ने हाल ही में छह से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा प्रदान करने का कानून बनाया है, लेकिन शिक्षाविदों ने इसकी सफलता पर संदेह व्यक्त किया है क्योंकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जद्दोजहद में लगा हुआ है।
सरकार के प्रयासों के बावजूद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इनमें बालिका शिक्षा की स्थिति गंभीर है।

07 नवंबर 2009

यादों के भी सहारे होते है

हर सागर के दो किनारे होते है, कुछ लोग जान से भी प्यारे होते है, ये ज़रूरी नहीं हर कोई पास हो, क्योंकी जिंदगी में यादों के भी सहारे होते है !

04 नवंबर 2009

वह सूखा पेड़ हरा भरा हो गया है

जब वह पेड़ सूखा, और कमज़ोर था तब कोई नही आता था बैठने उसकी ठंडी छाँव में नही बनाते थे पक्षी घोंसला उसकी टहनियों पे भिगो जाती थी बारिश भी उसके कमज़ोर तन को लेकिन अब वह पेड़ फिर से हरा भरा हो गया है तो पक्षी उसकी टहनियों पर रोज़ नए नए गीत गुनगुनाते हैं अब बारिश भी नही भिगोती उसके तन को वह पेड़ भूल गया गया है पिछली सारी बातें मुझे ऐसा लगता है कि कहीं वो पेड़ मैं तो नही?
हमारे मित्र महफूज़ अली के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....