28 फ़रवरी 2010

होली की हार्दिक शुभकामनाए



आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाए इस आशा के साथ की ये होली सभी के जीवन में 
ख़ुशियों के ढेर सरे रंग भर दे ....!! 

1411 बाघ बचाओ आन्दोलन


कैसी बिडंबना है कि पहले लोग बाघों से डरा करते थे और जंगलों में जाने से बचते थे कि कहीं से कोई बाघ न आ जाए॥! और अब आलम यह है कि लोग बन्दूक इत्यादि हथियार लेकर जंगलों का रुख करते हैं..। वो भी बाघों का शिकार करने! वही डर जो पहले इंसानों में बाघों के प्रति हुआ करता था, अब बाघों के जेहन में बैठ गया है। उन्हें लगता है कि क्या जाने कहीं से कोई इंसान आ जाए और अपनी बन्दूक का निशाना बना ले।
एक ज़माना था जब लोग बाघ से बचते थे, और आज का ज़माना है जब लोग बाघ को बचाते हैं।
देश के बाघ संरक्षित क्षेत्रों में इस वर्ष अब तक पांच बाघों की प्राकृतिक या अन्य कारणों के चलते मौत हुई है।
पर्यावरण और वन राज्य मंत्री जयराम रमेश ने लोकसभा में बताया है कि वर्ष 2008 में देश भर में अत्याधुनिक प्रणाली का इस्तेमाल कर हुई बाघों की अनुमानित गणना के मुताबिक भारत में।,411 बाघ [मध्य संख्या] हैं। इस बारे में न्यूनतम संख्या।,165 और अधिकतम संख्या।,657 है।  इसी तरह गणना में है।
  देश के विभिन्न बाघ संरक्षित क्षेत्रों में इस वर्ष कुल पांच बाघों की मौत प्राकृतिक या किन्हीं अन्य कारणों के चलते हुई है। इनमें दो बाघों की मौत उत्तराखंड के कारबेट में, दो की मौत असम के काजीरंगा में और एक मौत मध्य प्रदेश के पेंच राष्ट्रीय उद्यान में हुई है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2007 से अब तक काजीरंगा बाघ संरक्षित क्षेत्र में 16, कारबेट में 15 और मध्यप्रदेश के कान्हा में आठ बाघों की मौत हो चुकी है।
बाघ बचाओ, बाघ बचाओ, बाघ बचाओ, बाघ बचाओ ..........................

26 फ़रवरी 2010

सफर



सफर

मीलों दूर तक जाना है,

एक नया जहाँ बनाना है,

झुकना मना है, थकना मना है,

मंजिल से पहले रुकना मना है !

पता है मुश्किलें तो आयेंगी,

मुझको, मेरे हौसले को आज़मायेंगी,

पर मैं न डरूंगी, मैं न मरूंगी,

सीने में सैलाब लिए,

मुश्किलों पर ही टूट पडूँगी !

इन मुश्किल हालातों में,

अचानक मेरे ख्यालों में,

किसीकी मुस्कान याद आती है,

उसकी प्यारी बातें दिल के तार छेड़ जाती है,

कोई था, जो मुझे अकेला छोड़ गया,

सारे रिश्ते, सारे बंधन,

एक पल में ही तोड़ गया !

जब आँखें भर आती है,

और यादें तडपाती है,

उसकी आवाज़ कहीं से आती है,

हौसला ना हार,

कर सामना तूफ़ान का,

तू ही तो रंग बदलेगा आसमान का !

करता जा अपनी मंजिल की तलाश;

तेरे साथ चलेंगे ये दिन ये रात;

चलेगी ये धरती, ये सकल आकाश !

काटों को फूल समझता चल;

बाधा को धूल समझता चल;

पर्वत हिल जाए, ऐसा चल;

धरती फट जाए ऐसा चल;

चल ऐसे की, तूफ़ान भी शरमाये

तेज़ तेरा देखकर,

ज्वालामुखी भी ठण्ड पर जाए !


Babli ji, aapne bahut khoobsoorat likha
mujhe itna pasand aaya ki apne blog par bhi post kar diya.

http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com






24 फ़रवरी 2010

कोई आँखों से बात कर लेता है ,


  कोई आँखों से बात कर लेता है ,
 कोई आँखों से मुलाकात कर लेता है |
 बड़ा मुस्किल होता है जवाब देना  ,
 जाओ कोई खामोश रह कर सवाल कर लेता है |

22 फ़रवरी 2010

पहचानिए निज भाषा के महत्व को

 


संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अध्ययन के मुताबिक 5300 भाषाओं/बोलियों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। अगर इस वैश्विक भाषा संकट को न भी समझ पाएं, तो भी अपने इर्द-गिर्द हम ऐसे तमाम समुदाय देख सकते हैं, जहां नई पीढ़ी अपनी पारंपरिक सामुदायिक भाषा को या तो भूलती जा रही है या पूरी तरह से भूल चुकी है।
भाषाओं और बोलियों पर यह संकट बहुत छोटे स्तर से शुरू होकर बहुत बड़े स्तर तक फैल रहा है। जाहिर है सबसे ज्यादा संकट मातृभाषाओं या निज-बोलियों पर ही है। सवाल है एक ऐसे दौर में जब दुनिया फैलती जा रही है, सरोकार वैश्विक हो रहे हैं, इंटरैक्शन ग्लोबल हो चुका है।
 कहने का मतलब यह है कि बड़े स्तर पर जहां पूरी दुनिया में एकरूपता आ रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर या कहें छोटे स्तर पर देशों के अंदर भी इसी तरह की अंतर्देशीय एकरूपता अथवा समरूपता आ रही है। इस समरूपता ने कई चीजों को सार्वभौम बनाया है। मसलन खानपान, पहनावा, काम-धंधे और शिक्षा-दीक्षा के साथ-साथ संपर्क की भाषा को भी एकरूपता देने की कोशिश की गई है।
मातृभाषा दरअसल वह भाषा होती है, जिसमें हम सबसे पहले संपर्क करना या संवाद करना सीखते हैं, लेकिन जरूरी नहीं है कि किसी की मातृभाषा वही हो जो उसकी मां की हो, क्योंकि ज्यादातर यह देखने को मिलता है कि मां के बजाए पिता की भाषा ज्यादा वर्चस्वशाली होती है, खासकर भारत जैसे पारंपरिक पुरुषवादी समाज में तो यही बात देखने को मिलती है।
मातृभाषाएं कम से कम भारत जैसे देश में तो विशुद्ध रूप से मातृभाषा ही नहीं होती, वह स्थानीय व कबीलाई भाषा होती हैं। चूंकि इन भाषाओं में बाजार, कारोबार, पढ़ाई और औपचारिक रिश्तों का संपर्क या तो है ही नहीं या बहुत कम है। इसलिए भी यह भाषाएं सिर्फ मौखिक भाषाएं बनकर रह गई हैं और अब जबकि मौखिक स्तर पर भी इन भाषाओं का कम इस्तेमाल हो रहा है तो जाहिर है कि विलुप्त होने की तरफ बढ़ेंगे ही।

21 फ़रवरी 2010

ए बादल तू नाराज क्यो है



ए बादल तू नाराज क्यो है
क्यो गरज रहा रूठ कर
सनम हमसे मिल जो रहे है
तेरी बूंदों में घुल कर !


हमारे मित्र आनंद के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ  आप तक

18 फ़रवरी 2010

हम रहे या ना रहे



हम तेरे साथ चलेंगे ,

तू चले या न चले ,

तेरा हर दर्द सहेंगे ,

तू कहे न कहे ,

तेरी परछाई बन के रहेंगे ,

तू माने या ना माने ,

हम चाहते है की ,

आप सदा खुश रहे दोस्त

हम रहे या ना रहे |



संजय भास्कर

17 फ़रवरी 2010

शुभ रात्रि



आदत मुस्कुराने की तरफ़ से

सभी ब्लॉग उपयोगकर्ताओ को

रात्रि - कालीन नमस्कार

शुभ रात्रि


फ्रॉम संजय भास्कर



16 फ़रवरी 2010

सबसे ज्यादा प्यार करते है |



चाहते जो हद से ज्यादा किसी को ,
वही तो सबसे ज्यादा तकरार करते है ,
करो न फिकर अगर वो नाराज हो जाये ,
नाराज होते है वही ,
जो सबसे ज्यादा प्यार करते है |

संजय भास्कर

15 फ़रवरी 2010

तितलियों के दीदार के लिए तरसती हैं अब आंखें।



गांव-देहात के बागों की हरियाली, रंग-बिरंगे खिलखिलाते फूल और उनपर मंडराती रंग-बिरंगी तितलियां! इस खूबसूरत मंजर को देखकर सारी थकान छू मंतर हो जाती थी लेकिन वक्त बदला तो आबोहवा भी बदल गई। अब इन फूलों पर तितलियां नहीं मंडरातीं। बागबां हैरान-परेशान है। प्रकृति की इस अनोखी छटा को दीदार के लिए तरसती हैं अब आंखें।
दरअसल अब गौरैया, चील व गिद्ध के बाद तितलियां भी कम दिखती है। आम तौर पर वसंत के दिनों में रंग-बिरंगी आकर्षक तितलियां सहज ही लोगों का मन मोह लेती थीं। नीली, पीली, हरी, काली, सफेद, बैंगनी वगैरह-वगैरह तमाम रंगों में पंख फैलाए फूलों का रस चूसती तितलियों को देख बच्चे उसे पकड़ने के लिए घंटों मशक्कत करते थे। यहां तक कि बड़े भी इन तितलियों के आकर्षण पाश में बंध कर खिलखिलाते थे। अब ये सारी बातें इतिहास बनती जा रही है।



13 फ़रवरी 2010

वेलेंटाइन डे युवा वर्ग के लिए खास






वेलेंटाइन डे पर युवा दिल अपने मन की बात एक-दूसरे को बताने के लिए बेकरार हो रहे हैं। 14 फरवरी को कोई गुलाब के फूल के साथ प्यार की पेशकश करेगा तो फिर कोई किसी अन्य बहाने से।
अगर पूछा जाए तो प्रेम पाश में फंसने की चाहत रखने वाले युवक युवतियों को शायद फरवरी ही सबसे अच्छा महीना लगता होगा। हो भी क्यों न, आखिर यह महीना सिर्फ वेलेंटाइन ही नहीं, बल्कि ऐसे ही कई दिवसों को अपने में समेटे हुए है जो युवा वर्ग के लिए खास हो सकते हैं।
फरवरी में दिवस मनाने की शुरूआत सात तारीख से ही हो जाती है जब 'रोज डे' [गुलाब दिवस] पड़ता है। इससे आगे 20 फरवरी तक दिवस आयोजन की भरमार होती है।
किसी को प्रपोज करने के लिए आठ फरवरी को 'प्रपोज डे' पड़ता है तो नौ फरवरी को चॉकलेट डे पड़ता है। 10 फरवरी जहां 'टेडी डे' कहलाती है, वहीं 11 फरवरी का दिन किसी से वायदा करने या किसी से वायदा कराने का दिन यानी कि 'प्रॉमिस डे' कहलाता है। दिवसों की यह सूची यहीं समाप्त नहीं हो जाती। अगर गूगल पर सर्च मार दें तो लिस्ट और भी लंबी होती चली जाती है।

11 फ़रवरी 2010

आज फ़िर एक बार








आज एक बार फ़िर सूरज को उगता देखो |
और चाँद को चान्दनी रात मे जागता देखो |
क्या पता कल ये धरती चाँद और सूरज हो ना हो
आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो
आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते और ये यादें हो ना हो

संजय भास्कर

10 फ़रवरी 2010

अच्छा है न...तो हंसिये




शराब पी के जिन्दगी की प्रॉब्लम सोल्व नहीं की जा सकती..

लेकिन प्रॉब्लम तो जूस और दूध पी के भी सोल्व नहीं की जा सकती......?????

इसलिए......चक गलासी...


अच्छा है न...
तो हंसिये

09 फ़रवरी 2010

......क्यों है.. .......






सूख जाना ही है उसको इक रोज़,

तो पत्ता डाली पर पनपता क्यूँ है....

डरता है बदनामी से इस कदर,

तो यह दिल प्यार करता क्यूँ है... बिछड़ना है

तो दिल में प्यार पनपता क्यों है

मरना है तो इन्सान जन्म लेता क्यों है

सवालों के जवाब चाहिए










08 फ़रवरी 2010

गरीब हूँ मैं.......




रोटी के लिए घूमता रहता हूँ ,
इधर उधर ,
पाँव छिल जाते है ,
रुकता नही हूँ मगर ,
दिल से देगा मुझे कोई उसे भगवान् उसे बहुत देगा
मेरी दुआ है सभी के लिए ,
चाहे कोई बड़ा हो या छोटा ,
मिटटी के खिलौनों से खेलते है बच्चे मेरे ,
गर्मी सर्दी बारिश को   हंस कर झेलते है
सर पर छत भी न दे सका अपने बच्चो को
बाप में अजीब हूँ
गरीब हूँ में मजबूर हूँ मैं ,
पूरी नही कर पाता बच्चो की इच्छाओ को ,
बहुत ही बदनसीब हूँ मैं ,
गरीब हूँ मैं गरीब हूँ मैं......


संजय भास्कर



05 फ़रवरी 2010

कहीं ऐसा तो नहीं


 


कहीं ऐसा तो नहीं की 
हम इस दुर्लभ जीवन के 
अनमोल  क्षणों  को 
गवा रहे है 
दुनिया की चकाचौंध  
तो क्यों न हम 
स्वयं मै झांके 
की हम कितने पानी मैं है |
कैन ऐसा तो नहीं की 
हम अटक गए है 
आलस्य  मै , परमद मै 
और भूल बैठे है 
अपने  ध्येय को अपने कर्त्तव्य को 
तो क्यों हम पहचाने 
समय की महता को 
मेहनत की गरिमा को 
और हमारे कदम बढ उठे 
सृजन के पथ पर .......
नई मंजिल की ओर............... 

03 फ़रवरी 2010

देश सबका है






बीज बो गए विषमता के ,
 आज यहाँ सापों की खेती उग आई है
क्यारी को फिर से  सँवारो ,
बीज नए डालो प्यार के हमदर्दी के ,
मेड़ें मत बाँधो,
लकीर मत बनाओ बीच मै ,
मत करो  देशका विभाजन ,
जातिवाद और धरम के नाम पर ,
क्योकि धरती सबकी है ,
देश सबका है |




संजय भास्कर

02 फ़रवरी 2010

सरस्वती वंदना




सरस्वती वंदना

ॐ एं सरस्वत्यै नमः

या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता

या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा



01 फ़रवरी 2010

हर नई सुबह नया पैगाम लाती है

 
 हर नई सुबह एक नया पैगाम  लाती है 
आदत मुस्कुराने की तरफ़ से
सभी ब्लॉग उपयोगकर्ताओ को प्रातः कालीन नमस्कार
फ्रॉम
संजय भास्कर