31 दिसंबर 2009

2010 का साथ होगी खुशियों की बरसात



कुछ दिनों की है बात
फिर हर रोज होगी मुलाकात
कुछ तुम कहना कुछ हम कहेंगे
अपने दिल की बात
कैसे कैसे सपने देखे
कैसे बीती वो आपसे दूर रह कर रात
बिता 2009 आ रहा 2010 का साथ
इंतज़ार की घडिया ख़तम होने को
रूबरू होंगे लेकर खुशियों की बरसात





29 दिसंबर 2009

 श्रीहनुमानचालीसा



दोहा



श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥


बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥


चौपाई


जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥


महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥


बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥


सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥


लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥


सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥


जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।


तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥


राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥


आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥


नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥


सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥


चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥


अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥


तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥


और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥


जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥


जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥


दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥



28 दिसंबर 2009

एक दिन ही की तो बात थी





मैं उनसे कुछ कह न सका

एक दिल की ही तो बात थी

चंद पल बिता न सके वो मेरे संग

एक दिन ही की तो बात थी

दुख तो आज हो रहा है यारो

जो वो जनाजे में भी न आए

आखिर एक दिन ही तो बात थी



हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....



26 दिसंबर 2009

'बड़ा दिन'

हम ऐसा कुछ काम कर सकें

हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.
बनें सहायक नित्य किसी के-
पूरा करदें उसका सपना.....
केवल खुद के लिए न जीकर
कुछ पल औरों के हित जी लें.
कुछ अमृत दे बाँट, और खुद
कभी हलाहल थोडा पी लें.
बिना हलाहल पान किये, क्या
कोई शिवशंकर हो सकता?
बिना बहाए स्वेद धरा पर
क्या कोई फसलें बो सकता?
दिनकर को सब पूज रहे पर
किसने चाहा जलना-तपना?
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.....
निज निष्ठा की सूली पर चढ़,
जो कुरीत से लड़े निरंतर,
तन पर कीलें ठुकवा ले पर-
न हो असत के सम्मुख नत-शिर.
करे क्षमा जो प्रतिघातों को
रख सद्भाव सदा निज मन में.
बिना स्वार्थ उपहार बाँटता-
फिरे नगर में, डगर- विजन में.
उस ईसा की, उस संता की-
'सलिल' सीख ले माला जपना.
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.....
जब दाना चक्की में पिसता,
आटा बनता, क्षुधा मिटाता.
चक्की चले समय की प्रति पल
नादां पिसने से घबराता.
स्नेह-साधना कर निज प्रतिभा-
सूरज से कर जग उजियारा.
देश, धर्म, या जाति भूलकर
चमक गगन में बन ध्रुवतारा.
रख ऐसा आचरण बने जो,
सारी मानवता का नपना.
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.....



संजीव 'सलिल'  ji
के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ..




http://divyanarmada.blogspot.com







23 दिसंबर 2009

बेटी


  जब तुम पास नहीं होती

तब मैं अकेली होती हूँ।


 इसे तुम जानती हो, माँ
                                             
                                   इसीलिए तो अपने आशीष


                                  रोज गूँथ देती हो


                                  मेरी वेणी में सवेरे- सवेरे..


                                  अपना सारा लाड़


                          आँज देती हो मेरी आंखों में


                                   घर से निकलते समय.


                                  तुम दुनिया भर में


                                 सबसे अच्छी माँ हो,


                                        -मेरी माँ .

                             ऋषभ ji के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....
  http://rishabhakeekavitaen.blogspot.com/2009/12/blog-post_1800.html

22 दिसंबर 2009

शादी का मतलब पता नहीं, बन गई दुल्हनियां





सन् 1915 में पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी रचित कालजयी कहानी 'उसने कहा था' की परिछाया इस गांव में भी दिखती है। इस कहानी के बाल नायक का सवाल था री कि..। नायिका की तरह ही बांका जिले के बाराहाट प्रखंड स्थित महुआडीह गांव की विवाहित लड़कियों को शादी का सही मतलब तक मालूम नहीं है।

सात साल की उम्र में ही उनकी शादी कर दी जाती है। हां, शादी के सवाल पर उनके चेहरे भोलेपन से खिलखला जरूर उठते है, क्योंकि उसे इसके खौफनाक अंजाम का भान नहीं होता है। यह बेजा भी नहीं है, क्योंकि खुद उनके अभिभावक भी यह बात गर्व से बताते है कि उन्होंने तो महज आठ साल में ही अपनी बच्ची की शादी कर दी।
कानूनन लड़की की शादी 18 व लड़के की 21 वर्ष के बाद करने का यहां कोई असर नहीं दिखता है। इस गांव में अत्यंत पिछड़े वर्ग के चपोत जाति के लोग निवास करते है। लगभग ढाई सौ परिवार वाले इस गांव में बाल विवाह की परंपरा अभी भी जीवित है। यहां के लोग मानते है कि 12 की उम्र सीमा बाद लड़की की शादी जाति-धर्म के खिलाफ है।
फिलहाल यहां सात वर्ष की बच्चियां भी बेधड़क ब्याह दी जाती हैं। गांव के प्राथमिक विद्यालय की कई छात्राएं स्कूल मांग में सिंदूर भर कर जाती हैं। उन्हे यह तक पता नहीं है कि शादी किस बला का नाम है। हालांकि अभिभावक यह जरूर कहते है कि शादी केवल रस्म अदायगी के लिए होती है, विदाई लड़की की 15 वर्ष हो जाने पर ही की जाती है।
लेकिन 14 वर्ष की बाल मां की संख्या इस परम्परा के खौफनाक परिणाम की गवाह है। कई लड़कियां तो जवानी के उम्र ही बूढ़ी नजर आती हैं।
इसी तरह उनकी 13 वर्षीय पुत्री मीरा की शादी भी पांच वर्ष पूर्व हो चुकी है।
अनिल मांझी भी 10 वर्षीय पुत्री की शादी दो वर्ष पूर्व कर चुके हैं। बैजू मांझी की 12 वर्षीय पुत्री
मुन्नी एक साल ससुराल में रहकर भी आ चुकी है। उमेश मांझी की पुत्री पूनम 13 साल की है, उसकी भी शादी चार साल पूर्व हो चुकी है। यह फेहरिस्त बहुत लंबी है। गांव की सड़कों पर खेलती बच्चियों की भरी मांग खुद सब कुछ बयां कर देती है।


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21 दिसंबर 2009

लगती तू एक तस्वीर सी



लगती तू नूर सी है,

                                                मेरे पास होके भी दूर सी है,
                                                   तुझसे मैं कुछ कह नही सकता,
                                               जाने क्यो तू एक तस्वीर सी है !

19 दिसंबर 2009

वापस नहीं आयेंगे





तेरी दोस्ती को पलकों पर सजायेंगे हम



जब तक जिन्दगी है तब तक हर रस्म निभाएंगे


आपको मनाने के लिए हम भगवान् के पास जायेंगे


जब तक दुआ पूरी न होगी तब तक वापस नहीं आयेंगे |




17 दिसंबर 2009

जब कोई हमारा होगा


जब कोई हमारा होगा, हम उसके हो जायेंगें
हँसेगें साथ साथ, दुःख को भूल जायेंगें
जिन्दगी का सफर हम साथ में बितायेंगें
ज़माना क्या रोकेगा हमें
हम इन बन्धनों को पीछें छोड़ जायेंगें
दूर कही हम अपना एक घर बसायेंगें
उसे स्वर्ग से भी ज्यादा खुशहाल बनायेंगें
उस छोटे स्वर्ग में प्यार ही प्यार
वो हमें चाहेंगें और हम उन्हें दिल में ब्सायेंगें
जियेंगें एक दूजे के लिए
एक दूजे के लिए मर जायेंगें
अपने इस प्रेम से ईश्वर को पा जायेंगें
जब कोई हमारा होगा, हम उसके हो जायेंगें


हमारे मित्र Anand के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

14 दिसंबर 2009

अलग होना है, ऐसा लगता है

अलग होना है, ऐसा लगता है

सबको अलग होना है, ऐसा लगता है तेलंगाना बनाओ, हरित प्रदेश बनाओ बड़े दुखी हो अपनों से तुम, ऐसा लगता है बंट जायेगा घर तो बैठे रहना फिर बात करेंगे, तुम्हे कैसा लगता है

हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

10 दिसंबर 2009

बुढापा भी ख़ुशी ख़ुशी बीत जायेगा...

एक बार जो बोल लोगे हंस के उनके साथ बुढापा भी उनका ख़ुशी ख़ुशी बीत जायेगा... ये तो चली आई है परम्परा सदियों से जो आया है वो तो समां बीत ही जाएगा...
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

05 दिसंबर 2009

बोल कर भी उससे कुछ ना बोल पाया

बोल कर भी उससे कुछ ना बोल पाया बता कर भी उसे कुछ ना बता पाया जान कर भी उसे ना जान पाया छु कर भी उसे छु ना पाया ना जाने कहाँ से आई थी वो और ना जाने कहाँ चली गयी और मैं बस सोचता ही रह गया
ये खूबसूरत पंक्तियाँ मेरे अजीज दोस्त आमीन के ब्लॉग से

30 नवंबर 2009

इक अपने ने  भुला दिया  तो क्या गुनाह किया !

एक अपने ने रुलाया दिया तो क्या गुनाह किया , अरसा हुआ किस मुस्कराहट की झलक देखे , सदिया बीत गई चिडियो की चहक देखे , हमारे अपनों ने रुलाया है हमे , एक अपने ने मुह फेर लिया तो क्या गुनाह किया जिंदगी ने किया है हँसी मजाक हमसे , एक अपने ने कर लिया तो क्या गुनाह किया , ज़माने ने रुलाया है हमको , एक अपने ने रुलाया दिया तो क्या गुनाह किया तन्हाई में कोई नही है हमसफ़र मेरा , ज़माने ने जुदा किया है हमको इक अपने ने भुला दिया तो क्या गुनाह किया

26 नवंबर 2009

मीठे पर लोगो की गलतफहमियां

आधी-अधूरी जानकारी रखना नुकसानदेह हो सकता है।
विशेषकर तब जबकि आपको अपने भोजन के बारे में फैसला लेना हो।
वस्तुत: मीठे के संदर्भ में लोगों के मध्य कई गलतफहमियां व्याप्त है,
जिन्हे दूर करना जरूरी है। मिथ: वजन घटाने के लिए सभी मीठी खाद्य वस्तुओं से परहेज करना चाहिए! तथ्य: इस गलत धारणा से अनेक लोग ग्रस्त है।
खासकर किशोर-किशोरियां कुछ ज्यादा ही। सच तो यह है कि सामान्यत: वजन तभी बढ़ता है, जब हम विभिन्न खाद्य पदार्थो के जरिए जरूरत से ज्यादा कैलोरीज ग्रहण करते है। जितनी कैलोरीज आपका शरीर जलाता है यानी इस्तेमाल करता है, उससे अधिक कैलोरी ग्रहण करने से आपके वजन के बढ़ने
की संभावनाएं बढ़ जाती है।
सच तो यह है कि खान-पान की गलत आदतें वजन बढ़ाने में सहायक है, न कि मीठा।
फ्रॉम
डॉ. काजल पंडया
सीनियर न्यूट्रीशनिस्ट

24 नवंबर 2009

जीना है तो तेरी मरजी, नही तो मरजा....

बामुलाज़ा होशियार खबरदारमहंगाई हो चुकी है
असरदारआटा होगा बीस का किल्लोसोच-सोच
घबराए बिल्लोचावल कौन-सा कम
हैमिसेज शर्मा को तो यही गम हैदाल
तो पहले ही खा चुकी है
भावफ्राई, मखनी खाने के धरे रह गए चावहोने वाली है
चीनी चालीस पारक्या पकाओगे और फ़िर क्या खाओगे
बरखुरदारपीएम साब बोले,
तैयार रहना मेरी प्रजासब्जी के लिए लेना पड़ सकता है
कर्जा जीना है तो तेरी मरजी,
नही तो मरजा....
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

19 नवंबर 2009

दोस्ती सच्ची हो तो वक्त रुक जाता है !

दोस्ती सच्ची हो तो वक्त रुक जाता है ,
आसमा लाख ऊँचा हो मगर झुक जाता है ,
दोस्ती में दुनिया लाख बने रुकावटे ,
अगर दोस्ती सच्ची हो तो ,
खुदा भी झुक जाता है !

18 नवंबर 2009

मेरा घर कब्जाना चाहते हैं !


मेरा घर कब्जाना चाहते हैं कभी चीनी तो कभी पाकिस्तानी भाई बनकर मेरे हाथ बंधे हैं मैं क्या करूं कैसे लडूं इनसे मैं मैं बेचारा भारत चाहता हु सबका भला कभी पहल नही करता अब तो दूज करना भी भूल गया हूँ पर घर तो मुझे बचाना ही है ये तो मेरा खजाना ही है पर मैं करू तो क्या वो मेरा घर कब्जाना चाहते हैं मेरे भाई बनकर
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

17 नवंबर 2009

खूब हंसो हँसना ही जिंदगी है !

हंसें और खूब हंसें। अगर आप ध्यान लगाना चाहते हैं तब तो और भी हंसें, क्योंकि यह ध्यान की पहली सीढ़ी है। हो सकता है कि आपको यह पढ़कर कुछ ताज्जुब हो, लेकिन विशेषज्ञों का यही मानना है। यदि आप ध्यान का अभ्यास करना शुरू करते हैं, तो सबसे पहले इधर-उधर भटक रहे मन को एकाग्रचित करना होता है। जब हम हंसते हैं, तब भी सब कुछ भूल कर एकाग्रचित हो जाते हैं। बीते दिनों की पीड़ा पीछे छूट जाती है। हंसते समय हमारा दिमाग तनावमुक्त होकर सिर्फ वर्तमान पर केंद्रित हो जाता है। हमारा शरीर, संवेदना और आत्मा भी इस क्रिया में सम्मिलित हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति सुबह के समय हास्य ध्यान योग का अभ्यास करता है, तो वह दिन भर प्रसन्न रह सकता है। यदि शाम को इसका अभ्यास किया जाए, तो न केवल रात को अच्छी नींद आती है, बल्कि सुखद सपने भी आते हैं। मन की शक्ति का प्रयोग हास्य योग गुरु जितेन कोही कहते हैं कि हंसना भी योग है। जहां हास्य का अर्थ है मन की ऊर्जा को बढ़ाना, वहीं योग का मतलब होता है जोड़ना। इसलिए ये दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।
हंसने के कई फायदे हैं। इससे सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। हमारे मस्तिष्क को बहुत अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत होती है। हंसने से बड़ी मात्रा में हवा शरीर के अंदर चली जाती है। इस क्रम में फे फड़ों का भी व्यायाम हो जाता है

16 नवंबर 2009

काश! कोई तो समझ पाता मेरे दिल के हालात् !

काश! कोई समझ पाता मेरे दिल के हालात् ! कैसे कहूँ? हैं लफ्ज़ नहीं ................... कहने को.................. ॥ एक दिन था कि हसीँ लगती थी दुनिया सारी यह चिलचिलाती धूप भी, हमें लगती थी प्यारी॥ आज तुम नहीं तो कुछ नहीं, सारी दुनिया ही बेकार है यह ज़िन्दगी रही ज़िन्दगी नहीं, अब तो यह ज़िन्दगी बेज़ार है॥ तुम्हारे न होने से ,काटने को दौडे यह चांदनी,
रो पड़ता हूं कभी कभी ,
जब आती हैं यादें पुरानीदिल तो रो रहा है,
पर आँसू बहते ही नहीं ,
शायद वे भी समझ न सके ,
मेरे दिल के हालात् ॥ बंद करता है 'महफूज़ '
अपनी कलम अब यहीँ,
कोई पैगाम हो तो भेजना,
ग़र समझ सको तो समझ लेना,
मेरे दिल के हालात् ॥ ॥ ॥
हमारे मित्र महफूज़ अली के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

12 नवंबर 2009

शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है

आजादी के छह दशक से अधिक समय गुजरने के बावजूद आज भी देश में सबके लिए शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है। देश में भले ही शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कवायद जारी है, लेकिन देश की बड़ी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने के मद्देनजर सभी लोगों को साक्षर बनाना अभी भी चुनौती बनी हुई है। सरकार ने हाल ही में छह से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा प्रदान करने का कानून बनाया है, लेकिन शिक्षाविदों ने इसकी सफलता पर संदेह व्यक्त किया है क्योंकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जद्दोजहद में लगा हुआ है।
सरकार के प्रयासों के बावजूद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इनमें बालिका शिक्षा की स्थिति गंभीर है।

07 नवंबर 2009

यादों के भी सहारे होते है

हर सागर के दो किनारे होते है, कुछ लोग जान से भी प्यारे होते है, ये ज़रूरी नहीं हर कोई पास हो, क्योंकी जिंदगी में यादों के भी सहारे होते है !

04 नवंबर 2009

वह सूखा पेड़ हरा भरा हो गया है

जब वह पेड़ सूखा, और कमज़ोर था तब कोई नही आता था बैठने उसकी ठंडी छाँव में नही बनाते थे पक्षी घोंसला उसकी टहनियों पे भिगो जाती थी बारिश भी उसके कमज़ोर तन को लेकिन अब वह पेड़ फिर से हरा भरा हो गया है तो पक्षी उसकी टहनियों पर रोज़ नए नए गीत गुनगुनाते हैं अब बारिश भी नही भिगोती उसके तन को वह पेड़ भूल गया गया है पिछली सारी बातें मुझे ऐसा लगता है कि कहीं वो पेड़ मैं तो नही?
हमारे मित्र महफूज़ अली के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

27 अक्तूबर 2009

उन्हें आज भी आजादी चाहिए

उन्हें आज भी आजादी चाहिए आजादी जीने की हंसने की, बतलाने की आजादी चाहिए कमाने की भरपेट खाने की करोड़ों, जो गरीबी के गुलाम हें उन्हें आजादी चाहिए, आजादी आजादी कहने की जुल्म न सहने की आजादी उठने की, बैठने की देखने की, अपनी आंखों से सुनने की, अपने कानों से. वो हरपल तुम्हें खून देते हैं अब तुम बताओ तुम बताओ, क्या 'सुभाष' की भांति तुम उन्हें आजादी दोगे?
लेखक
आमीन

26 अक्तूबर 2009

वादा करो छोडोगी नहीं तुम मेरा साथ.....

तन्हाई में जब मैं अकेला होता हूँ, तुम पास आकर दबे पाँव चूम कर मेरे गालों को, मुझे चौंका देती हो, मैं ठगा सा, तुम्हें निहारता हूँ, तुम्हारी बाहों में, मदहोश हो कर खो जाता हूँ. सोच रहा हूँ..... कि अब की बार तुम आओगी, तो नापूंगा तुम्हारे प्यार की गहराई को.... आखिर कहाँ खो जाता है मेरा सारा दुःख और गुस्सा ? पाकर साथ तुम्हारा, भूल जाता हूँ मैं अपना सारा दर्द देख कर तुम्हारी मुस्कान और बदमाशियां.... मैं जी उठता हूँ, जब तुम, लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में, कहती हो....... मेरे बहुत करीब आकर कि रहेंगे हम साथ हरदम...हमेशा....

Writer :- Mehfooz Ali

14 अक्तूबर 2009

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ।
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा ।
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा ।
जीवन का एक ऐसा साथी है
दूर हो के पास नहीं ।
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ।
हवा का एक सुहाना झोंका है
नाज़ुक तो कभी तुफानो सा ।
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले
दोस्त एक अनजाना सा