31 दिसंबर 2009

2010 का साथ होगी खुशियों की बरसात



कुछ दिनों की है बात
फिर हर रोज होगी मुलाकात
कुछ तुम कहना कुछ हम कहेंगे
अपने दिल की बात
कैसे कैसे सपने देखे
कैसे बीती वो आपसे दूर रह कर रात
बिता 2009 आ रहा 2010 का साथ
इंतज़ार की घडिया ख़तम होने को
रूबरू होंगे लेकर खुशियों की बरसात





23 दिसंबर 2009

बेटी


  जब तुम पास नहीं होती

तब मैं अकेली होती हूँ।


 इसे तुम जानती हो, माँ
                                             
                                   इसीलिए तो अपने आशीष


                                  रोज गूँथ देती हो


                                  मेरी वेणी में सवेरे- सवेरे..


                                  अपना सारा लाड़


                          आँज देती हो मेरी आंखों में


                                   घर से निकलते समय.


                                  तुम दुनिया भर में


                                 सबसे अच्छी माँ हो,


                                        -मेरी माँ .

                             ऋषभ ji के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....
  http://rishabhakeekavitaen.blogspot.com/2009/12/blog-post_1800.html

22 दिसंबर 2009

शादी का मतलब पता नहीं, बन गई दुल्हनियां





सन् 1915 में पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी रचित कालजयी कहानी 'उसने कहा था' की परिछाया इस गांव में भी दिखती है। इस कहानी के बाल नायक का सवाल था री कि..। नायिका की तरह ही बांका जिले के बाराहाट प्रखंड स्थित महुआडीह गांव की विवाहित लड़कियों को शादी का सही मतलब तक मालूम नहीं है।

सात साल की उम्र में ही उनकी शादी कर दी जाती है। हां, शादी के सवाल पर उनके चेहरे भोलेपन से खिलखला जरूर उठते है, क्योंकि उसे इसके खौफनाक अंजाम का भान नहीं होता है। यह बेजा भी नहीं है, क्योंकि खुद उनके अभिभावक भी यह बात गर्व से बताते है कि उन्होंने तो महज आठ साल में ही अपनी बच्ची की शादी कर दी।
कानूनन लड़की की शादी 18 व लड़के की 21 वर्ष के बाद करने का यहां कोई असर नहीं दिखता है। इस गांव में अत्यंत पिछड़े वर्ग के चपोत जाति के लोग निवास करते है। लगभग ढाई सौ परिवार वाले इस गांव में बाल विवाह की परंपरा अभी भी जीवित है। यहां के लोग मानते है कि 12 की उम्र सीमा बाद लड़की की शादी जाति-धर्म के खिलाफ है।
फिलहाल यहां सात वर्ष की बच्चियां भी बेधड़क ब्याह दी जाती हैं। गांव के प्राथमिक विद्यालय की कई छात्राएं स्कूल मांग में सिंदूर भर कर जाती हैं। उन्हे यह तक पता नहीं है कि शादी किस बला का नाम है। हालांकि अभिभावक यह जरूर कहते है कि शादी केवल रस्म अदायगी के लिए होती है, विदाई लड़की की 15 वर्ष हो जाने पर ही की जाती है।
लेकिन 14 वर्ष की बाल मां की संख्या इस परम्परा के खौफनाक परिणाम की गवाह है। कई लड़कियां तो जवानी के उम्र ही बूढ़ी नजर आती हैं।
इसी तरह उनकी 13 वर्षीय पुत्री मीरा की शादी भी पांच वर्ष पूर्व हो चुकी है।
अनिल मांझी भी 10 वर्षीय पुत्री की शादी दो वर्ष पूर्व कर चुके हैं। बैजू मांझी की 12 वर्षीय पुत्री
मुन्नी एक साल ससुराल में रहकर भी आ चुकी है। उमेश मांझी की पुत्री पूनम 13 साल की है, उसकी भी शादी चार साल पूर्व हो चुकी है। यह फेहरिस्त बहुत लंबी है। गांव की सड़कों पर खेलती बच्चियों की भरी मांग खुद सब कुछ बयां कर देती है।


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19 दिसंबर 2009

वापस नहीं आयेंगे





तेरी दोस्ती को पलकों पर सजायेंगे हम



जब तक जिन्दगी है तब तक हर रस्म निभाएंगे


आपको मनाने के लिए हम भगवान् के पास जायेंगे


जब तक दुआ पूरी न होगी तब तक वापस नहीं आयेंगे |




17 दिसंबर 2009

जब कोई हमारा होगा


जब कोई हमारा होगा, हम उसके हो जायेंगें
हँसेगें साथ साथ, दुःख को भूल जायेंगें
जिन्दगी का सफर हम साथ में बितायेंगें
ज़माना क्या रोकेगा हमें
हम इन बन्धनों को पीछें छोड़ जायेंगें
दूर कही हम अपना एक घर बसायेंगें
उसे स्वर्ग से भी ज्यादा खुशहाल बनायेंगें
उस छोटे स्वर्ग में प्यार ही प्यार
वो हमें चाहेंगें और हम उन्हें दिल में ब्सायेंगें
जियेंगें एक दूजे के लिए
एक दूजे के लिए मर जायेंगें
अपने इस प्रेम से ईश्वर को पा जायेंगें
जब कोई हमारा होगा, हम उसके हो जायेंगें


हमारे मित्र Anand के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

14 दिसंबर 2009

अलग होना है, ऐसा लगता है

अलग होना है, ऐसा लगता है

सबको अलग होना है, ऐसा लगता है तेलंगाना बनाओ, हरित प्रदेश बनाओ बड़े दुखी हो अपनों से तुम, ऐसा लगता है बंट जायेगा घर तो बैठे रहना फिर बात करेंगे, तुम्हे कैसा लगता है

हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

10 दिसंबर 2009

बुढापा भी ख़ुशी ख़ुशी बीत जायेगा...

एक बार जो बोल लोगे हंस के उनके साथ बुढापा भी उनका ख़ुशी ख़ुशी बीत जायेगा... ये तो चली आई है परम्परा सदियों से जो आया है वो तो समां बीत ही जाएगा...
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

30 नवंबर 2009

इक अपने ने  भुला दिया  तो क्या गुनाह किया !

एक अपने ने रुलाया दिया तो क्या गुनाह किया , अरसा हुआ किस मुस्कराहट की झलक देखे , सदिया बीत गई चिडियो की चहक देखे , हमारे अपनों ने रुलाया है हमे , एक अपने ने मुह फेर लिया तो क्या गुनाह किया जिंदगी ने किया है हँसी मजाक हमसे , एक अपने ने कर लिया तो क्या गुनाह किया , ज़माने ने रुलाया है हमको , एक अपने ने रुलाया दिया तो क्या गुनाह किया तन्हाई में कोई नही है हमसफ़र मेरा , ज़माने ने जुदा किया है हमको इक अपने ने भुला दिया तो क्या गुनाह किया

19 नवंबर 2009

दोस्ती सच्ची हो तो वक्त रुक जाता है !

दोस्ती सच्ची हो तो वक्त रुक जाता है ,
आसमा लाख ऊँचा हो मगर झुक जाता है ,
दोस्ती में दुनिया लाख बने रुकावटे ,
अगर दोस्ती सच्ची हो तो ,
खुदा भी झुक जाता है !

18 नवंबर 2009

मेरा घर कब्जाना चाहते हैं !


मेरा घर कब्जाना चाहते हैं कभी चीनी तो कभी पाकिस्तानी भाई बनकर मेरे हाथ बंधे हैं मैं क्या करूं कैसे लडूं इनसे मैं मैं बेचारा भारत चाहता हु सबका भला कभी पहल नही करता अब तो दूज करना भी भूल गया हूँ पर घर तो मुझे बचाना ही है ये तो मेरा खजाना ही है पर मैं करू तो क्या वो मेरा घर कब्जाना चाहते हैं मेरे भाई बनकर
हमारे मित्र आमीन के ब्लॉग से ये कुछ पंक्तियाँ....

17 नवंबर 2009

खूब हंसो हँसना ही जिंदगी है !

हंसें और खूब हंसें। अगर आप ध्यान लगाना चाहते हैं तब तो और भी हंसें, क्योंकि यह ध्यान की पहली सीढ़ी है। हो सकता है कि आपको यह पढ़कर कुछ ताज्जुब हो, लेकिन विशेषज्ञों का यही मानना है। यदि आप ध्यान का अभ्यास करना शुरू करते हैं, तो सबसे पहले इधर-उधर भटक रहे मन को एकाग्रचित करना होता है। जब हम हंसते हैं, तब भी सब कुछ भूल कर एकाग्रचित हो जाते हैं। बीते दिनों की पीड़ा पीछे छूट जाती है। हंसते समय हमारा दिमाग तनावमुक्त होकर सिर्फ वर्तमान पर केंद्रित हो जाता है। हमारा शरीर, संवेदना और आत्मा भी इस क्रिया में सम्मिलित हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति सुबह के समय हास्य ध्यान योग का अभ्यास करता है, तो वह दिन भर प्रसन्न रह सकता है। यदि शाम को इसका अभ्यास किया जाए, तो न केवल रात को अच्छी नींद आती है, बल्कि सुखद सपने भी आते हैं। मन की शक्ति का प्रयोग हास्य योग गुरु जितेन कोही कहते हैं कि हंसना भी योग है। जहां हास्य का अर्थ है मन की ऊर्जा को बढ़ाना, वहीं योग का मतलब होता है जोड़ना। इसलिए ये दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।
हंसने के कई फायदे हैं। इससे सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। हमारे मस्तिष्क को बहुत अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत होती है। हंसने से बड़ी मात्रा में हवा शरीर के अंदर चली जाती है। इस क्रम में फे फड़ों का भी व्यायाम हो जाता है

27 अक्तूबर 2009

उन्हें आज भी आजादी चाहिए

उन्हें आज भी आजादी चाहिए आजादी जीने की हंसने की, बतलाने की आजादी चाहिए कमाने की भरपेट खाने की करोड़ों, जो गरीबी के गुलाम हें उन्हें आजादी चाहिए, आजादी आजादी कहने की जुल्म न सहने की आजादी उठने की, बैठने की देखने की, अपनी आंखों से सुनने की, अपने कानों से. वो हरपल तुम्हें खून देते हैं अब तुम बताओ तुम बताओ, क्या 'सुभाष' की भांति तुम उन्हें आजादी दोगे?
लेखक
आमीन