10 अक्तूबर 2010

.................अपना घर

 जवान बेटी को बाप ने कहा 
जाना होगा अब तुम्हे अपने घर ,
बी. ए  की करनी वही पढाई 
ढूंढ़ लिया तेरे लायक वर ,
अब तक तुम हमारी थी 
पर अब यहाँ से जाना होगा 
जुदा होकर हमसे 
नया घर बसाना होगा ,
बेटी ने बहु बनकर बी. वाली बात दोहरायी
सुनकर उसकी बातें सास गुर्राई 
अगर आगे ही पढना था 
तो पढ़ती ' अपने घर '
बहु है हमारी अब सेवा कर ,
बेटी ने सोचा और समझा 
कौन सा है मेरा घर 
या फिर बेटिया दुनिया में 
होती है ........बे घर  | 

........संजय


06 अक्तूबर 2010

................कुछ फ़र्ज़ भी निभाना है


कुछ काम भी करना है कुछ फ़र्ज़ भी निभाना है ,
खुद को मिटा कर भी ये देश बचाना है |
 जो दुश्मन सीमा पर है उसे मिटा देंगे 
गद्दार जो अन्दर है उनको भी मिटाना है |
कोई धर्म या मजहब हो सब भाई भाई हैं
रूठे हुए भाइयो को सीने से लगाना है |
ये देश सलामत है तो हम भी सलामत है ,
हर देश के वासी को यह याद दिलाना है |
भूंखा न रहे कोई न कोई नंगा हो
ये काम मुश्किल
है  पर करके दिखाना है |
खेतो में हमारे भी सोने के खजाने है ,
इक फसल
मोहब्बत की दिल में भी उगाना है |
ये गर्व हो हर इक को भारत का मै वासी हूँ
इस शान से जीने का अंदाज सिखाना है |



...........संजय भास्कर


03 अक्तूबर 2010

दहेज़ की दूकान पर .............हास्य व्यंग

 सेल  ! सेल ! सेल !
आज रविवार है ,
सजा हुआ एक अद्भुत बाज़ार है |
हर तरह का माल तैयार है '
कोई चपरासी ,कोई थानेदार तो कोई तहसीलदार है |
भाव पदानुसार है ,
किसी की कीमत लाख तो किसी की हजार है |
चोंकिये  मत यह  ' दुल्हों ' का बाजार है |
 

.......संजय